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रूबरू शायद...

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कई बार कुछ ख़यालात आते हैं, गुजरे लम्हों को अपने साथ लिए फिर हम उनके साथ हो लेते हैं जैसे किसी दोस्त के साथ, उन ख़यालों के साथ घूमने का कोई अर्थ नही होता.. बेवजह ही सही ख़यालों के माध्यम से अपने उस अतीत से जुड़ जाते है, जिसे हम कभी दोहरा नही सकते। इसे हम एक प्रक्रिया भी कह सकते है। खुद से दोबारा रूबरू होने की या परिस्थितियो को फिर से समझने की या फिर समस्याओं को फिर से सुलझाने की जिनका अब कोई मतलब नही है। इसका हमारे जीवन पर शायद ही कोई प्रत्यक्ष प्रभाव होता हो..

अपने अतीत को फिर से जीकर हम किसी मंज़िल तक शायद ही पहुँचते हो, बस हम उलझकर रह जाते है,परिस्थितियाँ भी काम करती है, हम कहाँ है? हमारा वैचारिक स्तर क्या है? या हमारा परिवेश कैसा है? इन सभी का भी हमारे अतीत को फिर से परिभाषित करने पर असर पड़ता है। इसका कोई मतलब हो या न हो मनुष्य उलझता है वर्तमान से ज़्यादा मनुष्य अतीत या भविष्य मे जीना पसंद करता है, यही मनुष्य का जीवन है।

देवेश, सत्ताईस दिसंबर, 2015