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बुज़ुर्गों के साथ अतीत का सफर

शाम को जब सूरज ढल चुका था, तब पता नही क्या पर कुछ महसूस हो रहा था। तब किसी की याद भी नही आ रही थी। ना ही कोई असंतुष्टि ही थी। मैं बस अपने अंदर चुप हो रहा था। अंदर चुप होने का मतलब बाहर बोलना क़तई नही है। जब मैं अंदर से चुप होता हूँ तो मेरी आँखों की गति तेज़ हो जाती है। तब मैं तीन हो जाता हूँ एक जो बहार चुप है, दूजा जो भीतर चुप है और तीजा जो दिखने वाली वस्तुओं का सम्बन्ध आपस में जोड़कर नए-नए प्रयोग करने में लग जाता है। और ये सारी जोड़-तोड़ अंत में इस नतीजे पर पहुँचती है कि मैं उदास हूँ। अब भई उदास क्यों हूँ ? खोजते-खोजते भी इस खोज का अंतिम छोर नही मिल पा रहा है। हाँ एक कारण हो सकता है कि मैं बहुत थका हुआ हूँ। इस थकावट का कारण संभवतः कोई सफ़र रहा होगा। शायद बुज़ुर्गों के साथ पिछले दशकों में दौड़ आया होऊँ। पर बुज़ुर्ग कैसे दौड़ेंगे वे तो बुज़ुर्ग हैं? पर तब वो भी जवान हुआ करते थे। तब अगर मेट्रो होती तो वे कभी एक्सेलरेटर पर कदम तक नही रखते। तब उनके पिताजी दवाइयाँ ना ख़रीद पाने के कारण मरते नही। तब वो आसमान में उन्मुक्त भाव से उड़ जाते। पर तब इतना पैसा नही था। 
पर इसका ये मतलब नही की उनके पास कुछ भी न…

तुम्हें सोचते हुए...

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... और जब तेरह तारीख़ को मैं तुम्हें सोच रहा होऊंगा तो मेरा खाली मन किसी खूबसूरत रंग से भर जाएगा, वही रंग जिसकी टी-शर्ट कुछ लड़कियों को लड़कों पर अच्छी नही लगती। पर मैं फिर भी तुम्हारे लिए हफ्ते में तीन बार वही टी-शर्ट पहनूंगा। उस दिन भी पहनूंगा। उस दिन हम एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर यूं ही किसी सड़क पर चलते चले जाएंगे। तब ना मैं कुछ कहूँगा ना तुम, हम बस एक दूसरे को सुनते रहेंगे। सुबह सवेरे मैं अपनी गाड़ी की पिछली सीट्स को उसी रंग के गुब्बारों से भर दूंगा। तुमसे मिलते ही सबसे पहले मैं तुम्हे ओरकेट्स का गुलदस्ता दूंगा फिर अपने हाथों से बनाया एक ग्रीटिंग कार्ड जिसे देखकर हम दोनों की आँखें भर जाएंगी। और तब मैं तुम्हारा चेहरा छूऊंगा, पहली बार। अचानक मैं एक चुटकुला कहूँगा और तुम उन्मुक्तता से हँसती रहोगी देर तक। और मैं तुम्हे देखता रहूंगा।फिर कुछ देर बाद हम एक-दूसरे का कन्धा हो जाएंगे। दोपहर की चुभन भरी धूप में आइसक्रीम खाते हुए तुम मुझसे एक गाने की फ़रमाइश करोगी तो मैं अपनी बेसुरी आवाज़ में कोई गाना गाऊँगा। उस गाने को सुनकर तुम ज़रा स्तब्ध सी हो जाओगी फिर ज़ोरदार ठहाका मारकर हँसती रहोगी। मैं तुम…

साहित्यिक मूल्य और विद्यार्थी

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लिखना कभी भी आसान नही होता। भोगे हुए को फिर से कई बार भोगना पड़ता है। जीवन में जिन घटनाओं से नज़र बचाकर हम निकल जाते है, लिखने के दौरान हम खुद उसका हिसाब लेते हैं। तब हम कटघरे में खड़े होते है अपने ही सम्मुख। तब हमारी बातें सुनने वाला कोई नही होता, हमें खुद ही जूझना होता है। लेखक इसे इसी तरह भोगता होगा । ऐसा नही है कि जो लेखक नही वो इस स्थिति से अनभिज्ञ है। आम इंसान भी स्थितियों को ऐसे ही भोगता है परन्तु उसमे उतनी गहराई नही होती वह बस स्थितियों को ऊपर से छूकर ही छोड़ देता है जबकि लेखक जब तक तेह तक ना पहुँच जाए मानता नही। विषयों के आधार पर दृष्टिकोण भी परिवर्तित हो जाता है। किसी साहित्यिक रचना ख़ासकर गद्य रचना में हम समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, मनोविज्ञान, इतिहास, राजनीतिशास्त्र आदि खोज सकते हैं। लेखक रचना में इस सभी का संतुलन के साथ वर्णन करता है। मुक्तिबोध कला के जिन तीन क्षणों की बात कहते हैं, उसका दूसरा क्षण वही होता है जब हम घटना को अपने अंदर घोटते हैं, उसे परत दर परत समझते हैं। उसके बाद अपने लेखन की विशेष शैली के द्वारा इस तरह लिखते है कि वो रचना समाज का साफ़ आईना होने के साथ-साथ…