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दुनिया देख, फिर आईयो

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अभी यहीं इस कुर्सी पर बैठा हूँ। बाहर नहीं जा रहा। बाहर जाता हूँ तो मन में जो बन रहा है वह टूट जाएगा। इस पंक्ति के तीसरे कमरे में बैठकर मैं सोच रहा हूँ कि बाहर का मौसम कैसा होगा। बाहर धूप होगी या बादल ? हवा बोल रही होगी या चुप होगी ? आसमान गर दिख रहा होगा तो उसका रंग कैसा होगा ?   इस कमरे में अगर एक खिड़की होती तो ये सवाल बन ही नहीं पाते। मेरी नज़र मुझसे पहले बाहर जा चुकी होती और इन तीनों और इनके अलावा सबका हाल-चाल ले चुकी होती। लेकिन यहाँ कोई खिड़की नहीं है। केवल एक दरवाज़ा है। जिसका प्रयोग अंदर आने और बाहर जाने के लिए किया जाता है। दरवाज़ा खिड़की नहीं है। कुछ बातों को लेकर मैं स्पष्ट हूँ। जैसे कि बाहर जाने पर मुझे लोग नहीं दिखाई देंगे। अगर दो-चार लोग दिखेंगे भी तो कुछ देर में वे नहीं होंगे। उनकी जगह कोई और दो-चार लोग ले लेंगे। ये लोग खड़े होकर बातें नहीं कर रहे होंगे। न ही खेल रहे होंगे। न ही ख़रीदारी कर रहे होंगे। ये लोग घर जा रहे होंगे। उन घरों में , जो इनके नहीं हैं। उन घरों को निपटाकर इन्हें दूसरे घरों को भी निपटाना होगा। यहाँ रहने वाले लोग घरों से बाहर नहीं निकलते। निकलते हैं तो ज़मी