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कमरा अंधेरा

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उनकी शब्दावली में इसे भागना कहूँगा। मैं भाग रहा हूँ। भागता जा रहा हूँ। पर कहीं पहुँच नही रहा। समझ नहीं पा रहा कि किससे भाग रहा हूँ। कहाँ पहुँच जाने की इच्छा लिए फ़िर रहा हूँ। अब तक ऐसा क्या महसूस नही किया जैसा करना चाह रहा हूँ। वो क्या है जिसे लगातार ढूँढता रहता हूँ सभी की आँखों में? उसे कोई भी नाम देने से क्यों कतराता हूँ?  अपने लहज़े में मैं उसे भागना नहीं कहूँगा। वो मेरे लिए अवकाश होगा। कुछ दिनों के लिए सब से निजात। इससे कुछ न भी हो तब भी कुछ ज़रूर होगा।  मैं सबकुछ को जर्जर नहीं कहूँगा। अब भी बहुत कुछ है जो बचा है भीतर और बाहर दोनों सतहों पर लेकिन उन्हें देखकर भी उन्हें छू लेने की इच्छा नही है। बच रहा हूँ। क्यूँ? पता नहीं। साफ़ कहें तो इस सब में अपनी भूमिका पहचान लेने की जद्दोजहद में पिछले दिन घुटते रहे हैं। ये दिन भी जा ही रहे हैं। इसमें सबकुछ असंतुलित है। मिसफिट है। असंगत है। सब आधा है।  पर जो भी कमी महसूस कर रहा हूँ उसे उन सभी को कभी बता देने का मन होते हुए भी बता नहीं पाऊँगा। उसे भी कभी नही बताऊँगा। वो पूछ भी लेता है तब भी नहीं। मैं पहले पूरा हो जा...

अपनी किताबें

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शुरू से ये किताबें रसोई में ही रखी थीं। सारी पत्रिकाएं भी। हर बार जब भी कोई किताब निकलता उसपर तेल की परत और गहरी हो गई होती। अंदर के कागज़ भी पीले पड़ने लगे। मैंने पापा से किताबों की अलमारी के लिए कह दिया। हमारे कमरे में एक अलमारी कपड़ों की भी है। पर वो लोहे की है। ज़मीन से पाँच फुट छः इंच ऊंची। दूसरी अलमारी की कोई जगह कमरे में बची नही। पापा ने किसी जानकार बढ़ई से कहकर तीन खानों वाला, बराबर लंबाई चौड़ाई वाला एक कामचलाऊ शेल्फ बनवा दिया।  एक दिन दो लोग अचानक आ धमके। दीवार से कपड़ों वाला हैंगर बड़ी बेरहमी से उखाड़ दिया। मैंने जबसे होश संभाला तब से वो हैंगर वहीं, वैसे ही देख रहा था। हर बार सफ़ेदी के बाद उसके किनारों पर एक और परत जम जाती। आज उखाड़े जाने के बाद इस कमरे में हुई पहली सफ़ेदी की चमक उतने हिस्से में दिख रही थी जितने हिस्से को हैंगर ने घेर रखा था। हैंगर बूढ़ा और अपराजित सा नई शेल्फ के पास पड़ा था। उन दोनों लोगों ने नया शेल्फ उठाया। पुरानी अलमारी के बाईं तरफ दीवार से सटाया और धड़ाधड़ कीलें ठोकने लगे। मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी। ठका-ठक की आवाज़ से सर चकरा गया। ख़ैर किसी तरह शेल्फ संभाल ले...