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कमरा अंधेरा

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उनकी शब्दावली में इसे भागना कहूँगा। मैं भाग रहा हूँ। भागता जा रहा हूँ। पर कहीं पहुँच नही रहा। समझ नहीं पा रहा कि किससे भाग रहा हूँ। कहाँ पहुँच जाने की इच्छा लिए फ़िर रहा हूँ। अब तक ऐसा क्या महसूस नही किया जैसा करना चाह रहा हूँ। वो क्या है जिसे लगातार ढूँढता रहता हूँ सभी की आँखों में? उसे कोई भी नाम देने से क्यों कतराता हूँ?  अपने लहज़े में मैं उसे भागना नहीं कहूँगा। वो मेरे लिए अवकाश होगा। कुछ दिनों के लिए सब से निजात। इससे कुछ न भी हो तब भी कुछ ज़रूर होगा।  मैं सबकुछ को जर्जर नहीं कहूँगा। अब भी बहुत कुछ है जो बचा है भीतर और बाहर दोनों सतहों पर लेकिन उन्हें देखकर भी उन्हें छू लेने की इच्छा नही है। बच रहा हूँ। क्यूँ? पता नहीं। साफ़ कहें तो इस सब में अपनी भूमिका पहचान लेने की जद्दोजहद में पिछले दिन घुटते रहे हैं। ये दिन भी जा ही रहे हैं। इसमें सबकुछ असंतुलित है। मिसफिट है। असंगत है। सब आधा है।  पर जो भी कमी महसूस कर रहा हूँ उसे उन सभी को कभी बता देने का मन होते हुए भी बता नहीं पाऊँगा। उसे भी कभी नही बताऊँगा। वो पूछ भी लेता है तब भी नहीं। मैं पहले पूरा हो जा...

दुःख

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कुछ कहना क्या ज़रूरी होता है कहने के लिए? कहूँ भी तो किससे? कोई सुनना भी चाहता है? ना सुने तो ना सही! अगर कहना ना भी चाहो तो कोई समझेगा नही। इस स्थिति में बस अकेले जूझा जा सकता है। जूझने में एक इंतज़ार होता है इस दौर के खत्म हो जाने का। क्या मुझे भी इसे इंतज़ार की तरह ही लेना चाहिए? मेरी उम्मीदें तो बनी नही रह सकती। इसलिए ये दौर एक ऊब से भरा रहा है। ये हाथ-पांव बंधे होने जैसा है, कि कोई रह-रहकर आपके गले की रस्सी को उस हद तक खींच लेता है कि मृत्यु एकदम नज़दीक आ जाए और अचानक रस्सी छोड़ दे। बात बस ज़बान पर आजाए पर दिमाग़ सचेत होकर ज़हर का घूँट भर ले।                        खुद को इस तरह रोक लेने से भी कुछ नही हो रहा। एक युद्ध ही चल रहा है। जो भले ही अदृश्य लगे लेकिन जो अपना असर छोटे-छोटे संकेतों में दिखा जाता है, जिन्हें कोई पकड़ नही पाता। ना पकड़ पाए उसमें भी मेरी ही जीत है और हार भी। ये लिखावट भी उसी युद्ध का प्रतिफल है। जिस तरह मैं यहाँ लड़ रहा हूँ उसी तरह हर कोई लड़ रहा है लेकिन आधे मेरी तरह चुप हैं।       ...