धागा
क्या थी वह मुलाक़ात समझ नहीं पा रहा. हम एक-दूसरे से अनजान किसी मैदान पर दौड़े जा रहे थे, एक-दूसरे से विपरीत. एक क्षण में हम दोनों दो आँखों में बदल गए. हम दौड़ते हुए ठहर गए. सहसा नहीं, बहुत देर में. हम दो लोग जो चार आँखों में बदल गए थे, बहुत दूर तक दौड़ नहीं पाए. हम एक-दूसरे को दूर तलक देखते रहना चाहते थे. देर तलक एक-दूसरे के सामने ठहर जाना चाहते थे. लेकिन हम एक मैदान में समय की किसी दौड़ में थे. ये एक स्वप्न था और इसे जल्द ही ख़त्म हो जाना था. जब हम आँखों में बदल गए तो कुछ देर तक आँखें ही बने रहे. जब तक हमें समय का भान हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. घड़ी बारह बजा चुकी थी. अब हमें आँखों से दोबारा दो जोड़ी पैरों में तब्दील हो जाना था, और समय की किसी दौड़ में दोबारा भागना शुरू करना था. हमारे मन में सवाल आया क्या इस दौड़ में हम साथ नहीं भाग सकते? अपने से विपरीत दौड़ने से पहले हमने तय किया कुछ देर तक हम साथ में दौड़ेंगे.
हमने उस मैदान में दौड़ना शुरू किया. हम कभी
बहुत क़रीब आते तो कभी बहुत दूर हो जाते. अपनी बातों में हमने अपने आप को जाना. हम
शायद एक-दूसरे के चेहरे को छूना चाहते थे. लेकिन नहीं छुआ. हम धीरे-धीरे भरे पूरे
मनुष्यों में बदल रहे थे. हमारी इच्छाएँ थीं और कामनाएँ थीं और था वह क्षितिज तक
फैला मैदान. इस मैदान का कोई ओर-छोर नहीं था. हम वहाँ किसी कल्पना में खो गए. ये
मुलाक़ात न जाने कितने स्तरों पर चल रही थी. हम ख़ुद अनजान थे.
फिर कुछ हुआ. वह मैदान धीरे-धीरे आसमान में
बदलने लगा. वह हमारे सामने किसी चमकदार दृश्य की तरह खुला. इस आसमान में बहुत से
तारे थे, जो सतह पर बर्फ़ के ओलों की तरह बिखरे थे. वहाँ छोटे-बड़े रूई जैसे पीले
बादल भी थे. इन बादलों में कभी हम दिखते और कभी अंतर्धान हो जाते. कंचों की तरह न
जाने कितने ग्रह और तारे यूँ ही बिखरे पड़े थे वहाँ. दौड़ते हुए वे कभी-कभी हमारे
पैरों के नीचे आ जाते तो हम ज़ोरों से फिसल जाते और बादलों पर गिर पड़ते और बारिशों
से भीग जाते. कभी हम ख़ुद को उड़ते से महसूस होते. तो कभी सतह को छू जाते. इस
खेल-खेल में हमें एक चकोर भी मिला. वह चाँद की ठंडी रौशनी से नहाया हुआ था, लेकिन
चाँद को ढूँढ रहा था. विरह ने उसे थका दिया था. हमने उसे पश्चिम की ओर भेज दिया.
चाँद अभी हमसे मिलकर गया था.
यहाँ धूप सलेटी थी. इस सलेटी धूप में भी सब
स्पष्ट दिखाई देता था. सब चमकदार. यहाँ इतनी शांति थी जैसे पृथ्वी अभी बनी न हो.
वहाँ हवाएं थीं. उनमें राख की सी सुगंध थी. उस सुगंध में कभी-कभी हमारी देह की गंध
भी घुल जाती. हम बेहोश होने को होते लेकिन बेहोश होने से ऐन पहले संभल जाते. हमें
कहीं से किसी संगीत की भीनी-भीनी सी आवाज़ आती. फिर रुक जाती. हम उस धुन में पूरा
बौरा रहे थे. ये धुन धीरे-धीरे घड़ी की सूइयों की टिक-टिक में बदलने लगी. स्वप्न
बिखरने लगा. अब हम साथ दौड़ चुके थे और स्वप्न टूटने से पहले का सब समय बिता चुके थे,
हम अपनी मंजिल से कोसों दूर थे. लेकिन साथ थे. अब हमें अपने-अपने रास्तों पर लौट
जाना था.
मैं चौंककर जागा. मेरा माथा पसीने से भीगा
था. मेरे पैर दुःख रहे थे और आँखें भारी थीं. मुझे लगा बुख़ार है, लेकिन था नहीं.
मैंने एक गिलास पानी अपने गले से उतारा. स्वप्न की एक-एक घटना मेरी स्मृति में
किसी फ़िल्म के दृश्यों की तरह स्पष्ट थी. मैं बेचैन उठा था और पानी पीने की बाद भी
मेरी बेचैनी जा नहीं रही थी.
उस स्वप्न के बाद मेरे दिन सामान्य नहीं रहे.
मेरा दिन तीन हिस्सों में बंट गया. एक हिस्से में मैं सोता, एक में मैं काम करता
और एक हिस्से में मैं उसी स्वप्न में लौटने की कोशिशें करता. लेकिन ये तीनों
हिस्से समय के किसी खाके में बराबर नहीं बंटे थे. ये कब एक-दूसरे में मिल जाते पता
ही नहीं चलता. कब कौन-सा हिस्सा दूर तक खिंच जाता, पता ही नहीं चलता. कभी-कभी मैं
सोता तो चौबीसों घंटे सोता रहता. काम करता तो हफ़्ता भर साँस नहीं लेता और स्वप्न
में लौटने की कोशिश करता तो महीना उसी में निकल जाता. इस बीच हुआ ये कि मुझे लगने लगा
वह स्वप्न कोई हक़ीक़त ही रही होगी. मैंने उस स्वप्न को फिर से याद किया. उसकी एक-एक
घटना को तफ़सील से लिखा. दृश्यों के चित्र बनाए. मैं दिन-रात अपने शहर भर के
मैदान-मैदान भटकता रहा और उसी मैदान को ढूंढता रहा जिसपर मैं उन एक जोड़ी पैरों के
साथ दौड़ा था. मुझे लगा मैं उस मैदान को पा लूँगा तो वे घटनाएँ उसी तरह दोबारा घटित
हो जाएंगी. इस बार मैं उस स्वप्न को ख़त्म नहीं होने दूँगा.
मैं स्वप्न को याद करता और महसूस करता, जैसे
उसके और मेरे बीच एक धागा बंधा रह गया है. वह धागा किसी पाश में बाँध रहा है
मुझको. वह कभी ढीला पड़ जाता है और कभी इस तरह जकड़ लेता है कि साँस भी नहीं आती.
मैं इस बंधन से छूटना भी नहीं चाहता और इससे बंधे रहने की निस्सारता को भी समझ रहा
हूँ. मैं इसके टूटने के डर से इसे खींचता भी नहीं. यह धागा किसी स्वप्न से हक़ीक़त
में उतर आया है. क्या मैं भ्रमित तो नहीं हूँ? क्या सच में वह हक़ीक़त नहीं थी?
स्वप्न और हक़ीक़त में मैं इतना उलझ गया हूँ कि लगने लगता है मैं मानसिक रोगी हूँ.
लेकिन उस मैदान की तलाश छूटे नहीं छूट रही.
मैं ये भी सोचता हूँ इस धागे का क्या कोई
दूसरा छोर भी है? क्या वह छोर भी उन दो जोड़ी आँखों में इंतज़ार की बेचैनी से खिंची
लाल डोरियों सा उभर आता है? क्या वहाँ भी उस मैदान की कोई खोज जारी है?
उन आँखों में थोड़ी बेफ़िक्री थी, थोड़ी सहजता, थोड़ी कामनाएँ. मेरी
कल्पनाओं में वे आँखें कई बार उभर आईं. लेकिन उन आँखों को देखता तो लगता कि वो
कहीं और देख रही हैं. वे कहाँ, किस ओर देखतीं ये मैं जानना नहीं चाहता, हालाँकि मैं सब जानता था. फिर भी
मैं उसी सम पर लौटना चाहता, चाहता कि वह ताल फिर से शुरू हो. लेकिन अपने पहले बोल
से ही वह बिखर जाती. मैं फिर कोशिश करता और ताल फिर बिखर जाती. उसके बोल टूट जाते.
सब एक विध्वंसक से कोलाहल में बदल जाता. इस कोलाहल में मैं अकेला था. कम से कम
अपनी नज़र में.
बाद में समझ आया कि ये सब किसी संयोग का
प्रतिफल था. एक वक़्त था, एक जगह थी, एक मैदान था, एक हक़ीक़त थी, एक स्वप्न था, चार
आँखें थीं. इन सब ने मिलकर कुछ क्षणों के लिए जो बनाया था वह एक कहानी जैसा कुछ
था. वह कहानी कभी याद की तरह महसूस होती तो कभी किसी स्वप्न की तरह और कभी किसी
भाव की तरह. कुछ क्षणों की वह कहानी मेरे लिए जैसे कि उपन्यास की पृष्ठभूमि बन गई
थी. उनके आगे-पीछे न जाने कितनी और घटनाएँ जुड़ सकती थीं. कई और पात्र उसमें आकार
ले सकते थे. ये सब संभावनाएँ और इनकी आकृतियाँ मेरी कल्पना में रच रही थीं. मैं
इन्हीं में डूबता-उतराता रहता. इस सब में बहुत समय निकल गया.
अब मैं ठहर गया. स्वप्न और कल्पना के मोह से
निकल गया. आकर्षण को एड़ी के नीचे मसल दिया. कन्धों के बोझ और तलवों की अग्नि को
पहचान गया. मैं संयोगों के खेल को समझ गया. आकांक्षाओं के खिंचाव को तोड़ दिया. मैं
अब ठहर गया. उस रात मैं निश्चिन्त सोया. इतना निश्चिन्त कि न प्यास का भान हुआ न
पसीने का. मैं इतना बेफ़िक्र सोया कि सीधा भोर में उठा. सूरज अभी निकला नहीं था.
निकलने वाला था. पूरब के आकाश में कहीं भूरी रेखाएँ उभर आईं थीं. कहीं से कोयल की
आवाज़ आ रही थी. उठा तो हवाएँ ठंडी लगीं. मेरे चेहरे की सूजन ग़ायब थी. आँखें सेमल की
रूई जैसी हल्की थीं. साँसें ठीक थीं. बदन तितली के पंखों सरीखा हो गया था. मेरी
चाल गरिमा से भर गई. पानी मेरे गले में किसी निर्झर सा बहा. मैं जैसे कोई और
व्यक्ति हो गया था.
पुनश्च
कई बार ये भी लगता है. मैंने उस मैदान को हर
उस जगह ढूंढ लिया है जहाँ वह नहीं मिल सकता था. जहाँ उसके मिलने की संभावना थी,
मैंने वहाँ उसकी तलाश नहीं की. ये सब मैंने जान बूझकर किया. लेकिन क्यों? क्या
मुझे धागे के दूसरे छोर के मुझ तक ख़ुद पहुँच जाने का इंतज़ार था? या किसी अंतिम
मंजिल की तरह मैंने संभावित जगह को छोड़ रक्खा था? या उससे न मिल पाने की भावना की
गहनता को मैं लगातार महसूस करते रहना चाहता था? उस क़ुर्बत को मैं छोड़ना नहीं चाहता
था. अगर ये सब सच है, तो क्या मैं सच में उस मैदान में उसी तरह लौटना नहीं चाहता?
आज कुछ भी समझ नहीं पाता.

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