संदेश

जाना

चित्र
ये उसे भी नही पता होगा कि उसके इस तरह चले जाने से सब कितना बदल गया है। वो लड़का भी बदल गया है। पहले जैसा नही रहा। पहले जैसा कभी कुछ नही रहता। ये एक अच्छी बात है। जाने वाला भी बदल गया होगा लड़का इस बात से हमेशा डरा सा रहता है। उसे घूम-घूमकर पुरानी बातें याद आती हैं। अगर वो नही जाता तो? या जाने से पहले अगर लड़का उससे मिल लेता तो? या फिर अगर वो सब हुआ ही  होता तब? अपनी कल्पनाओं में वो वापस उसी दिन पर लौटता है जिस दिन वो आखिरी बार मिले थे। वहाँ जाकर वो खूब तेज़-तेज़ बोलता है। रोता है। अपने भीतर वो सबकुछ सही करने की क्षणिक शांति को महसूसता है और लौट आता है। तब उसे लगता है कल्पनाएँ कितनी बेकार चीज़ होती हैं। उनपर नियंत्रण रखकर भी कुछ नही होता। इस तरह ये लड़का अतीत और वर्तमान के बीच कल्पना और असल के दरवाज़े से आता-जाता रहता है। झूलता और टकराता रहता है।  एक दिन वो इस नतीजे पर पहुँचता है कि बीते साल ने उसे बर्बाद कर दिया है। पर ये किस तरह की बर्बादी है कि सबकुछ सही सलामत है? सब वैसा ही है। फिर जीभ और होंठों को हिलाकर दो शब्द एक साथ बुदबुदाता है 'आंतरिक बर्बादी'। इन्हें इस तरह बोलता...

कमरा अंधेरा

चित्र
उनकी शब्दावली में इसे भागना कहूँगा। मैं भाग रहा हूँ। भागता जा रहा हूँ। पर कहीं पहुँच नही रहा। समझ नहीं पा रहा कि किससे भाग रहा हूँ। कहाँ पहुँच जाने की इच्छा लिए फ़िर रहा हूँ। अब तक ऐसा क्या महसूस नही किया जैसा करना चाह रहा हूँ। वो क्या है जिसे लगातार ढूँढता रहता हूँ सभी की आँखों में? उसे कोई भी नाम देने से क्यों कतराता हूँ?  अपने लहज़े में मैं उसे भागना नहीं कहूँगा। वो मेरे लिए अवकाश होगा। कुछ दिनों के लिए सब से निजात। इससे कुछ न भी हो तब भी कुछ ज़रूर होगा।  मैं सबकुछ को जर्जर नहीं कहूँगा। अब भी बहुत कुछ है जो बचा है भीतर और बाहर दोनों सतहों पर लेकिन उन्हें देखकर भी उन्हें छू लेने की इच्छा नही है। बच रहा हूँ। क्यूँ? पता नहीं। साफ़ कहें तो इस सब में अपनी भूमिका पहचान लेने की जद्दोजहद में पिछले दिन घुटते रहे हैं। ये दिन भी जा ही रहे हैं। इसमें सबकुछ असंतुलित है। मिसफिट है। असंगत है। सब आधा है।  पर जो भी कमी महसूस कर रहा हूँ उसे उन सभी को कभी बता देने का मन होते हुए भी बता नहीं पाऊँगा। उसे भी कभी नही बताऊँगा। वो पूछ भी लेता है तब भी नहीं। मैं पहले पूरा हो जा...

सुनो अनुज

चित्र
मैं एक दिन दुनिया के सभी नियमों को बदल दूँगा। एक शाम को तय करूँगा कि रातभर सोऊंगा नहीं। उसके बाद हर रात को जागा करूँगा। दोस्ती और प्रेम भरे गीत सुना करूँगा और खूब रोया करूँगा। अंदर से सूख जाने के बाद मैं कहूँगा कि दोस्ती और प्रेम कुछ नही होते। ये बाज़ार के इजाद किये भाव हैं। इन सभी दृश्यों में तुम नहीं होंगे। मैं अकेला रहूँगा। उसी कमरे में बंद जिसे मैं अपना बना लेने के ख़्वाब देखा करता हूँ। उम्र में अनुज तुम कभी उसके दरवाज़े तक नहीं पहुँच पाओगे। मैं तुम्हें कभी नही बताऊँगा कि मैं कहाँ रहता हूँ। तुम भले ही प्रेम की कितनी ही व्याख्याएं करते रहो पर मैं कभी ये नहीं कहूँगा कि तुम्हारा उसकी ओर आकर्षण प्रेम है। और न ही ये कहूँगा की हमारी दोस्ती प्रेम नहीं है। पर मैं कभी प्रेमी नहीं हो पाऊंगा। न ही कभी उसे प्रेम लिखना सीख पाऊंगा। न ही तुम्हारा दोस्त रह पाऊंगा। सुनो अनुज। तुम दुनिया को देखने की अपनी नज़र बनाना। मैं जानता हूँ कि तुम समझदार हो और नासमझ भी। हम हमेशा साथ नहीं रहेंगे। सब दुनियाएं बदल जाएगी। लोग भी बदल जाएंगे। मैं भी बदल जाऊंगा। तब कोई सलाह नहीं दे पाऊंगा। देखो तुम प्रेम कर...

अपनी किताबें

चित्र
शुरू से ये किताबें रसोई में ही रखी थीं। सारी पत्रिकाएं भी। हर बार जब भी कोई किताब निकलता उसपर तेल की परत और गहरी हो गई होती। अंदर के कागज़ भी पीले पड़ने लगे। मैंने पापा से किताबों की अलमारी के लिए कह दिया। हमारे कमरे में एक अलमारी कपड़ों की भी है। पर वो लोहे की है। ज़मीन से पाँच फुट छः इंच ऊंची। दूसरी अलमारी की कोई जगह कमरे में बची नही। पापा ने किसी जानकार बढ़ई से कहकर तीन खानों वाला, बराबर लंबाई चौड़ाई वाला एक कामचलाऊ शेल्फ बनवा दिया।  एक दिन दो लोग अचानक आ धमके। दीवार से कपड़ों वाला हैंगर बड़ी बेरहमी से उखाड़ दिया। मैंने जबसे होश संभाला तब से वो हैंगर वहीं, वैसे ही देख रहा था। हर बार सफ़ेदी के बाद उसके किनारों पर एक और परत जम जाती। आज उखाड़े जाने के बाद इस कमरे में हुई पहली सफ़ेदी की चमक उतने हिस्से में दिख रही थी जितने हिस्से को हैंगर ने घेर रखा था। हैंगर बूढ़ा और अपराजित सा नई शेल्फ के पास पड़ा था। उन दोनों लोगों ने नया शेल्फ उठाया। पुरानी अलमारी के बाईं तरफ दीवार से सटाया और धड़ाधड़ कीलें ठोकने लगे। मुझे बड़ी बेचैनी हो रही थी। ठका-ठक की आवाज़ से सर चकरा गया। ख़ैर किसी तरह शेल्फ संभाल ले...

इन दिनों : अगस्त अट्ठारह

चित्र
अगस्त मेरे लिए कभी ऐसा नही रहा जैसा आज है। अगस्त महीने की याद से मुझे हमेशा दो चीजें सूझतीं हैं। सुबह की खिली-खिली धूप और रक्षाबंधन का त्यौहार। तब छत पर सोने से सुबह जल्दी आँख खुल जाया करती। सरसराती सी हवा मक्खियों को ज़रा भी चैन लेने नही देती। मैं सीढियां उतरकर आख़िरी सीढ़ी पर बैठ जाता और सामने दीवार पर पड़ने वाली धूप को देखता रहता। रक्षाबंधन वाले दिन सुबह से ही भुआओं का इंतज़ार होता रहता। वे आतीं और ज़ोर से हमारा नाम पुकारतीं। हम भागे-भागे सीढियां उतरते और उनसे चिपट जाते। नीचे दरवाज़े के बाहर सभी की चप्पलें बेतरतीब पड़ी रहतीं। मुझे दरवाज़े के बाहर इतनी सारी चप्पलें बड़ी अच्छी लगतीं, आज भी लगती हैं। मैं अपने पैर के अंगूठे और उंगलियों से उन्हें करीने से लगा देता। बुआ की चप्पल मुझे बहुत अच्छी लगती, ज़मीन से दो इंच ऊपर उठी हुई। उनकी साड़ी जैसी चमकीली। राखी बांधने के बाद शाम तक ठहाकों के कई दौर चलाने के बाद वे अपने-अपने घर वापस लौट जातीं। वो जब तक रहतीं घर गुलज़ार रहता। उनके लौटते ही एकदम सन्नाटा हो जाता। अब भी सबकुछ लगभग ऐसा ही होता है। पर अब हम बड़े हो गए हैं।  पिछले लगभग सभी अगस्त सितम्ब...

ना कह पाना

चित्र
एक समय आता होगा जब हर किसी को लगता होगा कि वह चुक गया। अब कहने को कुछ बाक़ी नही रह गया। ठीक उसी समय उसके पास बातों की एक दुनिया घुमड़ रही होती है। वह चाहता तो सबपर कुछ ना कुछ कह सकता है। पहाड़, नदी, बादल, आकाश, बोतल, चींटी, राज्यसभा, बिस्तर, पुल, किताबें इस सभी पर वह कह सकता है कुछ ना कुछ। असल नही तो मनघड़न्त ही सही। पर अब कहता नही। क्योंकि अब कहा नही जाता। जो वो कहता है वह एक क्षण में ही टूट जाता है। इस तरह बात टूटने से भाव और विषय सब बिखर जाते हैं। कहने का अर्थ तभी है जब सुनने वाला समझे। पर यदि कहा ही ना जा सके तो? भाषा होते हुए भी यदि ज़ुबान ना चले तो कोई क्या कर सकता है? यहाँ वह कहते कहते खुद को रोक भी लेता है क्योंकि जिस भाव को जिस तरीके से कहा जाना है वह उन्हें पकड़ ही नही पा रहा। भाषा तब साथ देती है जब मन में छवियाँ साफ हों। कहना क्या है ये पता हो। अभ्यास के महत्व को भी नकारा नही जा सकता। पर यहाँ तो कुछ साफ ही नही हो रहा। सब गड्डमड्ड है। उलझन बहुत है। शब्द सब साथ छोड़ रहे हैं।  रचना के तीनों क्षणों में से ये कोई भी क्षण नही है। ना तो इस समय कुछ भी समेटा जा रहा ...

वे दोनों

चित्र
ये पहली मंज़िल है। बाहर कड़ी धूप है। इस कमरे में केवल हम नहीं बैठे। हम लड़के-लड़कियों के अलावा एक युगल भी बैठा है। हम लड़के और लड़कियाँ ना चाहते हुए भी किसी न किसी बहाने से अचानक उन्हें देख लेने की इच्छा से भरे हुए हैं। वो दोनों बहुत धीमें से आपस में बात कर रहे हैं। वो नही चाहते कि कोई उनकी एक भी बात सुने। वो अपने अलग टापू पर हैं। वो अपनी इस दुनिया को अपनी पीठ से ढक लेना चाहते हैं। हम अपनी इस दुनिया से उन्हें देख रहे हैं। उन्हें इस तरह एक-दूसरे का हाथ पकड़े देखकर हम सभी कोई प्रतिक्रिया नही दे रहे। हम सब बातों में लगे हैं यही हमारी प्रतिक्रिया है। हम सभी लड़के-लड़कियाँ उन दोनों की ही तरह बैठ जाना चाहते हैं। इस बात से जो इनकार कर रहा है वह झूठा है।  वे लड़का और लड़की दोनी ही यहाँ से अनुपस्थित है। वो इस समय से टूट गए हैं उनकी स्मृति में रह गए हैं एक दूसरे के कंधे, हाथ और होंठ। मैं ये बार-बार कहता हूँ कि प्रेम तोड़ता भी है। ये टूटना ही अनुपस्थित होना है कई आयोजनों से, रिश्तों से, यादों और बातों से। उन दोनों की ही तरह यहाँ बैठे हम सब भी कंधे, हाथ और होंठ हो जाना चाहते हैं इनके अलावा और बहु...