गुरुवार, 21 सितंबर 2017

बच्चा फंस गया

जैसे ही उसने मझे देखा वो एक क्षण अचानक रुक गया फिर एकदम जल्दी से बोल गया "आओ सर मसाज" वो उंगली से जिस तरफ इशारा कर रहा था वहाँ होटल के बेसमेंट में जाती सीढियां थी जिसपर पारदर्शी काँच का दरवाज़ा था लेकिन वो दरवाज़ा मसाज करवाते हुए महिलाओं और पुरुषों के चित्रों से ढका हुआ था। वह जिस संकोच और भावशून्य चेहरे के साथ रास्ते में आने-जाने वालों को टोक रहा था, उससे ये साफ पता चल रहा था कि ये लड़का यहाँ नया है और उसे ये काम भा नही रहा है। उम्र उसकी चौदह से सोलह साल रही होगी। दिल्ली का वह नही था अन्यथा वो इस जगह इस तरह नही होता। इसका कोई अंदाज़ा नही लगाया जा सकता कि वह कितना पढ़ा होगा। अगर वह पढ़ता ही तो यहाँ नही होता, पर इस बात का कोई दावा भी नही किया जा सकता। पता नही वो कौन सी परिस्थितियाँ रही होंगी जब उसे यूपी या बिहार से दिल्ली आना पड़ा होगा। ट्रेन की धुकधुकी के बीच ना जाने दिल्ली के कैसे-कैसे चित्र बने होंगे। पता नही उन चित्रों में इंडिया गेट के अलावा और कोई ईमारत बन भी पाई होगी या नही। इस सफ़र के बीच उसने कई सपने भी बुने होंगे, उन सपनों में उसके माँ-बाप की मौजूदगी रही होगी या नही ये तो वही जाने, मैं तो ये भी नही जानता कि उसके दिल्ली पहुँचने में उसके माँ- बाप का कितना हाथ रहा है। लेकिन बात यह है कि अब वो दिल्ली में है और बहुत उलझा हुआ है। मसाज पार्लर की तरफ इशारा करते हुए उसका मन कैसा-कैसा हो जाता होगा। उससे ज़्यादा अजीब उसे तब लगता होगा जब लोग उसे किसी अपराधी की नज़र से देखते हैं। उसका मन मेरे मन से कितना भिन्न होगा ना। मैं कभी वैसा महसूस नही कर पाऊंगा जैसा वो महसूस कर रहा है। कितना कुछ तो है जो कहा नही जा पा रहा। मैं उससे फिर कभी मिलूंगा तब कुछ कहूँगा नही बस चुपचाप उसके पास से गुज़र जाऊंगा, पर वो गुज़रना वहीं पर रुक जाने जैसा ही होगा।

देवेश, 20 सितम्बर 2017 

गुरुवार, 22 जून 2017

पागलपन

यहाँ पास में ही स्टेशन है। सुबह शाम ट्रेनों के भोंपू की आवाज़ आती है। सर्दियों में तो सूचना देने वाली लड़की की आवाज़ भी ठीक-ठीक सुनी जा सकती है। साल भर में लाखों लोग सफ़र करते हैं यहाँ से। विश्व भर के लोग रहते हैं दिल्ली में उनका आना-जाना तो लगा ही रहता है। यहाँ आते-जाते कितने ही लोग अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं। कुछ भटक जाते हैं, कुछ उठा लिए जाते है। जिन्हें कुछ समझ होती है और पैसा हाथ होता है वो अपने घर-द्वार पहुँच जाते हैं लेकिन जिनपर कोई सूत्र नही होता वो यहीं छूट जाते है। उनमें से कई यहीं आसपास काम पर लग जाते हैं ख़ासकर बच्चे और बूढ़े। जो लोग परिवार से बिछड़ने का सदमा बर्दाश्त नही कर पाते वो धीरे-धीरे भ्रमित होने लगते हैं। उनकी चुप्पी उनके दिमाग़ पर हावी होने लगती है। एक स्थिति ऐसी आती है जब वे पागल हो जाते हैं। तब इनकी चुप्पी एक निरर्थक बातों में तबदील हो जाती है। वे लगातार किसी अदृश्य से बातें करते हैं। एक सामान्य व्यक्ति के लिए ये एक असामान्य स्थिति है। ये भूल जाते हैं अपनी पहचान, इनके पास केवल दो चीज़ें होती है इनकी बातें और इनका पेट। इन्हें कोई चिकित्सीय सहायता भी नही मिलती। ये घूमते रहते हैं शहर दर शहर, ये भूल जाते हैं अपना सबकुछ और एक दिन किसी फुटपाथ पर मृत पाए जाते हैं।
                                                                             बचपन में हम जब पुल पर टहलने जाया करते थे तो हमें एक पागल रोज़ दिखता था। सफ़ेद मैले हलके लम्बे बाल, काला चेहरा, मैले कमीज़ और पैन्ट। बाएं हाथ में एक पन्नी थामे रहता उसी हाथ में छोटी डायरी के साइज़ के कागज़ भी थामे रहता। दाएं हाथ में एक पेन या उसका रिफिल। ज़मीन पर बैठकर बस कागजों पर ना जाने क्या-क्या लिखता रहता। चाहे कुछ भी हो वो बस लगा ही रहता। वो देवनागरी में नही लिखता था, वो दक्षिण भारत की कोई भाषा थी। तब मैं छोटा था और सोचा करता था कि कभी इस पागल की ग़ैरमौजूदगी में इसके लिखे कुछ कागज़ चुरा लूँगा और उस भाषा को पहचानने वाले किसी व्यक्ति से पढवाउंगा। ये कभी हो नही पाया। पागल शब्द के अन्दर ढक जाता है सब उम्र, व्यक्तित्व, जात आदि तब केवल एक शब्द ही व्यक्ति की पहचान बन जाती है। कितने ही साल हुए वो फिर दिखाई ही नही दिया, पता नही कहाँ गायब हो गया।
                                                                            साहित्य पागलों को हमेशा एक अलग नज़र से देखता है। हालाँकि पागल शब्द का प्रयोग जिन लक्षणों को बताने के लिए होता है वे तो वही रहते हैं लेकिन सन्दर्भ बदल जाते हैं कभी वह प्रेम का सन्दर्भ लिए रहता है तो कभी भक्ति आदि का। साहित्य में पागल चरित्रों का निर्माण हमेशा पते की बात कहने के लिए होता रहा है जो हमें पागल नज़र आता है वही ऐसी बातें कह जाता है जो पूरे कथा, नाटक, उपन्यास का सार हो जाती हैं। इन पागल पात्रों के माध्यम से समाज की कोई ऐसी परत उघडती है जिसे हम सामान्य रूप से नही देख पाते। इनके पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी होती है।
                                                                              हम भी कभी-कभी किन्ही ख़ास परिस्थितियों में खुद को पागल सा महसूस करते हैं। जब हम खुद पर, अपने दिमाग़ पर अपना नियंत्रण खोने लगते हैं। लेकिन हम पूरे पागल होते नही। पागल होना असल में समझदार होते जाना है। जब आप सच्चाइयों को जान जाते हैं तो आप पागल कह दिए जाते है। आप सवाल उठाइये तो तुरंत आपका कोई शुभचिंतक आपको कह देगा 'पागल है क्या?' लेकिन थोड़ा थोड़ा पागल होना ज़रूरी है। लीक से हटकर सोचना और चलना भी पागलपन है। बिना सनकी या पागल हुए कलाकार नही हुआ जा सकता कलाकार होने के लिये बंदिशों को तोड़ना होता है सीमाओं को विस्तृत करना होता है। सीमाओं तो खोलना सिखाता है पागलपन।

 देवेश, 22 जून 2017

रविवार, 11 जून 2017

मक़बूल उर्फ़ हुसैन


अब तक उसके चेहरे के साथ कोई ऐसा चेहरा शायद ही नज़र आया हो जो बचपन से अब तक साथ रहा हो। वक़्त सभी को एक-एक कर छीन लेता है। बेशक वो अपने माँ-बाप की अकेली औलाद था। उसने कभी अपनी माँ को नही देखा, उसे नही पता कि उसकी माँ किस तरह किस ख़ुशी से उसे चूमती होगी, उसके चीख़-चीख़ के रोने पर किस तरह बेचैन हो जाती होगी। उसके पिता उसके साथी रहे, जब तक उनकी उम्र रही वे अपने लड़के को संभालते-संवारते रहे। लेकिन लड़के के ज़हन में जो अब तक बसा हुआ था वह था लम्बी अचकन में समाया एक बुज़ुर्ग। ये लड़का अपने दादा की उंगली पकड़े ना जाने कहाँ-कहाँ घूमा। कभी तो उसे लगा होगा कि उसकी माँ का चेहरा ज़रूर दादा जैसा रहा होगा। एक दिन अचानक दादा यूँ गए जैसे कभी थे ही नही। लड़का अकेला हो गया। दादा की अचकन के लिपटकर कितना, कितने दिन रोया। चेहरा पीला पड़ गया। ज़िन्दगी रंग बदलती रही लेकिन इसके ज़हन में दादा की याद बराबर बनी रही।
                                                                               
                                                                             अपने घर की लालटेन से इसे बड़ा लगाव था। इसने लालटेन को कभी केवल रौशनी करने वाला यंत्र नही समझा। यंत्र भले ही जीवित प्रतीत हो लेकिन वो होता निर्जीव भी है। लालटेन की भी इसे जीवित महसूस होती, उसकी रौशनी में इसे दुनिया का सारा सौन्दर्य नज़र आता। जैसे सारे संसार की सारी चमक एक बाती में जोड़ दी हो। इसी गर्म रौशनी में ढलते अनेक रंगों को इसने अपने मन में जज़्ब कर लिया।
                                                                                 इस लड़के का नाम मक़बूल  है। कक्षा में इसने ब्लैक बोर्ड पर अपने अध्यापकों के सटीक चित्र बनाकर अपने सस्थियों का ख़ूब मनोरंजन किया। इसके हाथों में गज़ब की कला। दुनिया के हर रंग से प्यार। हाथों में ब्रश आते समय नही लगा। पिता भी बेटे की कला का पहचान गए, खूब साथ निभाया। शिक्षा और अभ्यास से मक़बूल अपना आकार ग्रहण करने लगा। इंदौर और मुंबई जैसे शहर इसके अनुभव के आधार बने और ये लड़का बन गया पेंटर, फिल्मों के ये बड़े-बड़े पोस्टर पेंट करने वाला पेंटर, जो मेहनत तो बड़ी करता लेकिन मेहनताना छोटा पाता। ये भी बड़े संघर्ष का समय रहा। फिर फ़जीला बीबी से निकाह हुआ, तब से पीछे मुड़कर नही देखा।
                                                                                  इसने अपने वर्तमान में भी अपने अतीत को अपने साथ बनाए रखा। इसे सब याद था... पंढरपुर की गलियाँ, दादा, इंदौर, बचपन के मेले सबकुछ। अपना अतीत अपनी पोटली में लिए ये रंगता जाता है कैनवस दर कैनवस धरती, आकाश, जल, औरत, आदमी, बच्चे सभी। गाढ़े रंगों में ज़िन्दगी का गाढ़ापन घोलकर ये रंगने लगा ज़िंदगियाँ, धीरे-धीरे मक़बूल धुलता गया और निखरता गया मक़बूल फ़िदा हुसैन। ये जिस पेंटिंग पर हस्ताक्षर करते उसकी कीमत आसमान छूने लगती। इनकी पहली फिल्म को जब सभी ने नकार तो विदेशियों ने उसे उचित सम्मान दिया। जब ये माधुरी पर फ़िदा हुए तो 'गजगामिनी' बना बैठे। एक अलग ही रंग हुआ इनकी फिल्मों का। चित्रकार के हाथों बनी ये फ़िल्में भी चटख रंगों, चित्रात्मकता और सांकेतिकता लिए हुए थी।
                                                                                    साहब की पेंटिंग्स में जो औरतें मिलती हैं उनमें अधिकतर का चेहरा नही मिलता लेकिन चेहरे के पीछे की ममता ज़रूर संप्रेषित होती है। हुसैन ने अपनी माँ को नही देखा था, शायद इसीलिए वो चेहरा नही मिलता केवल मदर टेरेसा का चोला मिलता है जिसमें ममता का अथाह सागर समाया होता है।
                                                                                    धीरे-धीरे मकबूल एक बड़ा पेंटर तो बन गया लेकिन गुज़रे दिनों और लोगों को कभी भूला नही। वह चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो दिन में एक बार चाए में रोटी डुबाकर खाना नही भूलता। वह भले ही ब्रान्डिड कपड़े पहनता पर रहता नंगे पैर। उसके सारे अनुभव बार-बार जीवित होते रहे उसकी चित्रकारी में। जैसा मक़बूल बचपन में था बुढ़ापे तक वैसे ही रहा। एक पेंटिंग का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। हुसैन बड़े आहत हुए। देश छोड़कर चले गए फिर कभी लौटे नही, बस एक ख़बर आई 'मशहूर पेंटर एम. एफ. हुसैन का इंतकाल हो गया।

 ( ऊपर दिया गया चित्र हुसैन जी कि आत्मकथा हुसैन की कहानी अपनी जुबानी से लिया गया है। हालाँकि जिस शैली में ये लिखा गया है इसका नाम मक़बूल की कहानी हुसैन की जुबानी ज़्यादा ठीक रहता।)

देवेश, 11 जून  2017

शुक्रवार, 2 जून 2017

यूँ देर से आना


इस पोस्ट को देखकर सबसे पहले सोचा होगा की चलो इसने इतने समय बाद कुछ तो लिखा। तब से अब तक क्या कर रहा था? क्यों कुछ लिखा नही? इसके कई जवाब मेरे पास हो सकते हैं और उनमें से आधे बहाने। दरअसल कुछ महीनों पहले मेरा फ़ोन कोई उठा ले गया। नाटक चल रहा था। हम मंच पर थे और मेरा फ़ोन नेपथ्य में। मुझे नही पता था कि नेपथ्य में ये राग चल रहा है। खैर... मैं दिल्ली आ गया और मेरा फ़ोन वहीं हिसार में रह गया। तब से अब तक नया फ़ोन नही लिया। ये जो लिखा जा रहा है ये एक पुराना फ़ोन है जिसकी नेमत है। जितने भी ड्राफ्ट थे वो इस फ़ोन में दिखते नही इसलिए उन्हें ठीक करके पोस्ट करना संभव नही। 
                         एक स्तर तक पहुँचने में कुछ साधन आपकी मदद करते हैं, एक समय पर आप उनके इतने आदि हो जाते हैं कि उनके बिना काम ही नही चलता। हमारी तो मजबूरी ही दूसरी है। ब्लॉग पर पोस्ट करने के लिए भले ही लिख फ़ोन पर लो पर उसे पोस्ट करने के लिए कंप्यूटर की ज़रूरत होती है जोकि है नही। मैं यहाँ जितना भी लिख पाया उसमें से एक-दो पोस्ट को छोड़कर सभी को फ़ोन पर लिखा। एक ईमेल कंपोज़ कर उसे ड्राफ्ट में सेव कर लिया फिर साइबर कैफ़े जाकर उस ईमेल के कंटेंट को कॉपी कर ब्लॉग में जाकर एक पोस्ट का रूप दे दिया। साइबर कैफ़े मुफ्त नही चलता सो घंटा भर का हिसाब से उसको भी दिया। साइबर कैफ़े जाने से बचने के लिए ब्लॉगर की एप्लीकेशन का सहारा लेना चाहा, उसमें भी एक पेंच, फोटो लगाओ तो पोस्ट पब्लिश ही ना हो और लेआउट वगैरह भी नही ठीक कर सकते। ऐसी एप्लीकेशन का जो हश्र होना चाहिए था वही हुआ। सुविधाओं का न होना बड़ा खलता है, उससे भी ज्यादा खलता है संभावनाओं का ना होना। शायद उन सुविधाओं के ना होने पर ही इतना कम लिखा जा रहा, हो ये भी हो सकता है कि पिछली पंक्ति बस एक बहाना भर हो... असल बात कुछ और ही हो।
                             इन बातों को जैसे कह दिया है वैसे कहना नही चाहता था। जिस साल भर की पोस्ट का ज़िक्र पिछली बार किया था ये सब उसमें आता लेकिन आ नही पाया। वो समय गया और बातें भी। बस यहाँ लिखने के अपने तरीके को कहना चाहता था सो कह दिया।

देवेश, 2 जून 2017

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

ये शहर वैसा नही...

यहाँ आकर वो सब धराशाई हो गया जो मन में था। ये शहर वैसा नही है जैसा अपनी कल्पनाओं में मैंने इसे बनाया था। ये उससे बिलकुल जुदा है। ट्रेन से नीचे क़दम रखते बिलकुल महसूस नही हुआ कि ये वही शहर है जिसके लिए हमने पूरे बारह घंटे सफ़र किया। ये कई हद तक दिल्ली को चारों तरफ से घेरे एनसीआर जैसा है। सब कुछ तो यहाँ वैसा ही है। मैं अभी तक इस शहर से मिल नही पाया। मैने उसे देखा भर है। मिलने के लिए समय चाहिए, बस वही तो नही था मेरे पास। सोचिये आप मुद्दतों बाद किसी अनजान शहर गए हों, पर उसे गौर से देखने भर की फुर्सत ही न हो। मेरे मन का शहर भी अब बाक़ी नही रहा कि उसे देखकर ही मैं इस शहर को जान पाता। जान भी जाता तो क्या होता? वह जानकारी एक बड़ा झूट होती। जैसे ये असल शहर भी नक़ल है उसी तरह नक़ल की नक़ल को जानने से कोई फ़ायदा नही होता। वह भी मुझे भ्रम में ही डालता। जैसे कोई असल दुनिया हमारी नकली दुनिया को आदर्श के भ्रम में डाले रहती है। लेकिन हम भी चालाक हैं। हम जहाँ तहाँ पेशाब कर उसके पूरे आदर्श पर पानी फेर देते हैं। ये शहर भी ऐसा ही है, ईमानदार और बेशरम बाक़ी सभी शहरों की तरह। पर इसकी भाषा में शहर वाली बात नही है। शहरों की भाषा शायद कठोर सी हुआ करती है। इसकी भाषा में गाँव की कोमलता अब भी बनी हुई है। ये भाषा की चालाकी भी हो सकती है, हो सकता है वो शब्दों के अर्थों में परिवर्तन कर हमें ठग रही हो। शब्दों की मिठास में फंसकर हम अर्थों की साज़िश को समझ ही न पा रहे हों। शहर की भाषा हमें कभी उस तरह आकर्षित नही करती जैसे बोलियाँ करतीं हैं। इस मामले में शहर एकदम नंगा होता है। किसी स्थान को जानने के लिए उसकी भाषा को जानना भी तो ज़रूरी है। मैं अभी उतना नही जान पाया जितना ज़रूरी है। मैं शायद अभी उस शहर के बारे में लिखने के काबिल भी नही हूँ, पर लिख रहा हूँ। उसे फिर से बना रहा हूँ अपनी तरह...

देवेश, 22 फरवरी 2017

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

अनजान शहर में...

कभी तो सोचा ही होगा वहां जाने के बारे में। फिर गया क्यों नही। किसी ने मुझे रोका भी तो नही था। पर कुछ ऐसा भी तो नही था जो मुझे वहां खींचे ले जाता। वहां मेरा घर नही, कोई रिश्तेदार नही, मैं जाता भी तो किसलिए? घूमना ही मेरा उद्देश्य होता। पर उस शहर में ऐसा क्या है जो उसे घूमने लायक बनाता है? एक नदी में ऐसा क्या हो सकता है जिसे देखने लोग कहीं से भी वहां आ सकते हैं? नदियाँ कहाँ नही है भारत में? सब जानते हैं कि पानी कैसे बहता है, किनारे की बालू कैसी ठंडी होती है, हवा नदी पर कैसी अठखेलियाँ करती है। मैंने बस इस शहर का नाम ही सुना था। मुझे नही पता था की यहाँ नदी भी बहा करती है। अब बस वहाँ जा रहा हूँ। घूमने नही। बस एक काम है। घूमने जाना मेरी किस्मत में नही है। इस बहाने ज़रा सा एक ग़ैर शहर से रु-ब-रु हो जाऊँगा। मुझे पता है मैं कभी इस शहर को फुर्सत से नही देख पाऊंगा। शहर का इतिहास आप कहीं भी पढ़ सकते है पर उसे कहीं और जी नही सकते। इतिहास और साहित्य में मैंने जिन्हें पढ़ा है मुझे पता है उनके घर आज भी यहाँ हैं पर वे मुझे वहाँ नही मिलेंगे। इमारतें भी सूनी होंगी और दो दिनों बाद मैं लौट आऊंगा। पर वो शहर मेरे साथ नही आएगा। मैं फिर लौट आऊंगा अपने शहर में। लौटना ना जाने क्यों मजबूरी लगता है। मैं लौटना नही चाहता वहाँ से कहीं और उड़ जाना चाहता हूँ। जो लोग लगातार घूमते होंगे वो पता नही कैसा महसूस करते होंगे। उन्हें तो अब आदत पड़ गई होगी उड़ने की। कागज़ के पंख होने ज़रूरी है उड़ने के लिये। आज मैं भी उड़ रहा हूँ किसी और के पंखों से। मुझे किसी ने भरोसा दिया है की कल को मैं भी किसी को पंख दूंगा। मुझे कुछ मालूम नही। भरोसा नही होता। ये सब बातें बेकार हैं। सच यही है कि सुबह वो शहर जब जागेगा तब तक मैं वहाँ पहुँच जाऊँगा पर शहर उदासीन रहेगा। उसे कोई फर्क नही पड़ेगा मेरे आने से...

देवेश, 5 फरवरी 2017

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

डायरी के वो पन्ने

डायरी के उन पन्नों को फाड़ देने से क्या होगा? उन्हें लिख देने से भी क्या हुआ था? वो बातें खुद से कहने से डर रहे थे तुम। तुमने लिख दिया, हल्के हो गए। तुम्हें रखना था उन कागजों को संभाल कर। उन्हें आग के हवाले करने की ज़रूरत क्या थी? वो तो वैसे भी जल रहे थे। तुम्ही ने तो उनमें आग उंडेली थी। अब छूट गए क्या उन बातों से जो उसमें लिखी थी? क्या अब वो बातें कभी याद नही आएंगी? मैं तुम्हारी जगह होता तो शायद नही जलाता उन पन्नों को। आज उन्हें फिर पढ़ता और कोशिश करता फिर वही महसूस करने की जो तब लिखते हुए महसूस कर रहा था। मैं उन्हें पढ़ता बार-बार हर हफ्ते दस दिन बाद। धीरे-धीरे सब ठंडा हो जाता। इस बात का डर मुझे भी होता कि कहीं उन बातों को कोई और ना पढ़ ले। मैं उस डायरी को किताबों की पंक्ति में सबसे नीचे रखता। जब कोई उस डायरी को छूता तो मैं उस पर बरस जाता। तुमने कहाँ से ली थी वो डायरी? उसे खरीदने से पहले तुमने क्या ऐसा महसूस किया होगा जो तुम्हें लिखने लायक लगा होगा? तब शायद तुम्हें कोई ऐसा मिला ही नही होगा जिसके सिर्फ कान हो ज़बान ना हो (मुझे भी अब तक नही मिला)। कहा हुआ ज़्यादा देर जीवित नही रहता, लिखा हुआ रह जाता है। उसका प्रभाव ज़्यादा होता है। जो ज़बान नही कह सकती वो उंगलियाँ कह देती हैं। वो डायरी भी जब बन रही होगी तो कुछ हाथ और उँगलियाँ उसे आकार दे रहे होंगे। उन्हें तब पता भी नही होगा की इसी डायरी को कभी यूँ कोई भस्म कर देगा। तुमने ग़लत किया। हो सकता है आज उन पन्नों में कुछ शब्दों का हेर-फेर करके एक बेहतरीन कहानी बनाई जा सकती। आजकल कहानीकार भी बहुत हो गए हैं शब्दों को बदलकर घटनाओं के रस को बदलना उन्हें बखूबी आता है। मैंने डायरी लिखना इसलिए शुरू किया कि जो हो रहा है वो लिख लूँ। आगे अतीत की पहचान उसी से करूँगा अपनी स्मृति पर मुझे भरोसा नही है। मुझे यकीन है तुमने और भी बातें लिखी होगी तुम्हारी पसंद-नापसंद, लड़ाई-झगड़े, प्यार-मुहब्बत वगैरह। उस लिखावट के शब्दों में भी एक प्रवाह रहा होगा बिलकुल तुम्हारी चाल की तरह तेज़ और सधा हुआ। अब कहने को कुछ नही है। मैं बस तुमसे कह रहा हूँ अपनी डायरी के उन पन्नों को कभी मत फाड़ना। उनमें वो सब होता है जिन्हें कभी ज़िन्दगी से फाड़कर जलाया नही जा सकता।

(इस बीच काफी लंबा अंतराल आगया, सोचा था एक सालभर की पोस्ट बनाने के बारे में पर वो भी नही हो पाया आगे देखते है क्या लिखा जाएगा काफी कुछ जमा हो गया है खैर... आपको नए साल की शुभकामनाएं हालाँकि एक हफ्ते से ज़्यादा समय हो गया है पर ठीक है मैं तो आपसे अभी मिल रहा हूँ।)

देवेश 10 जनवरी 2017