शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

मिसफिट

एक दिन अचानक सब नही बदला। सब बदल रहा था धीरे-धीरे, या फिर कुछ बदला ही नही अब तक। हाँ कुछ भी नही बदला। जो जैसा है वो वैसे ही रहना चाहता है। वो जहाँ बैठा है वहाँ से इंच भर भी नही खिसकना चाहता किसी और के लिए। तो क्यों उन्हें वहाँ होना चाहिए जहाँ वो होकर भी नही हैं। क्या वो उनकी दुनिया है भी? या वो अपनी बातों को ही पुल बनाकर वहाँ तक पहुँचने की नाकाम कोशिशें कर रहें हैं पिछले कुछ सालों से? वो भले ही कितनी कोशिशें कर लें लेकिन वो जानते हैं ये दुनिया उनकी नही। वो कभी भी उसमें रम नही पाए, ना ही कभी रम पाएंगे। वो अपनी दुनिया से निकलकर किन्ही और की दुनिया में अगर चाहेंगे भी तो जम नही पाएंगे। अपने से अलग उस दुनिया में वो ख़ुद को हमेशा मिसफिट ही महसूस करेंगे।

असल में मिसफिट होना ही उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी है। इन सभी बातों को सोचते हुए वो तीनों कई अन्य जगहों से अनुपस्थित हो गए हैं। उनकी अपनी दुनिया, नाटक, संगीत, चित्र और साहित्य के संसार से वो सभी अनुपस्थित हैं। इस अनुपस्थिति में वो कहीं भी नही हैं। उनके होने न होनें से किसी को कोई फर्क भी नही पड़ेगा। आज उनके आने से या कल जाने से कुछ होगा नही। यहाँ तक कि उनका स्थान भी खाली नही होगा, ये उनकी विफलता है कि वो स्थान ही नही बना पाए।

जिन नए रिश्तों के लिए वो चौंक कर ख़ुश हो जाया करते थे। आज उन्हें पक्का यक़ीन हो गया है कि वो रिश्ते कभी बन ही नही पाए। वो जब भी आपस में मिल रहे होते हैं हमेशा ही थोड़े-थोड़े ख़ाली हो जाया करते हैं। उनके बीच कुछ बचता ही नही बात करने को। उनके जो साझे अनुभव है वो नाकाफ़ी है उनकी बातों को पिरोने के लिए। हारकर वो चुप रह जाते हैं।

चुप होने का अर्थ नही कि वो सोच नही रहे हैं या कह नही रहे हैं। वो कहते सब है, चीख़कर भी कहते हैं लेकिन वो किसी को सुनाई ना दे इस तरह कहते हैं। इस भीड़ में अकेले होने पर भले ही कोई व्यंग्य करे और कहे कि ऐसा कुछ नही होता लेकिन इस स्थिति को वो क्या नाम देगा?

अब उन्होंने सब को अपने हाल पर छोड़ दिया है। यहाँ ना तो डूब जाने की इच्छा है और ना ही उबर जाने की बेचैनी। इस स्थिति को फिलहाल कोई नाम नही दिया जा सकता। इस स्थिति को ऐसा बनाए रखने में किसी भी कला का कोई दोष नही है। कला से पहले संबंध होते हैं। सम्बन्ध हम ही तो बना रहे हैं। इन संबंधों का जो रूप बन रहा है उसकी ज़िम्मेदारी हमारी साझी है। यहाँ सबका दोष है और सब निर्दोष भी।

देवेश, 11 जनवरी  2018

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

एक अधूरी प्रेमकथा

अभी कुछ कह देने की बेचैनी नही है, मन कुछ अजीब सा हो रहा है। बस उसकी याद आ रही है। आज से दो साल दो दिन पहले उसने ज़हर खाया था। जब उसका पहली बार नाम सुना था तब से अब तक मैं उसको एक भी बार नही मिला। बस उसकी कुछ तस्वीरें देखी थीं और एक बार फ़ोन पर बात की थी। उसका चेहरा जाना पहचान सा था, हमारी रिश्तेदारी में एक लड़की है राधा, पूजा बिलकुल उसकी तरह दिखती थी। पर वो राधा के बिलकुल उलट थी। उसे घर में रहना पसंद था। धर्म-कर्म में भी मन लगता था। पढ़ना उसके लिए सिर्फ एक मजबूरी थी, या कहें शादी तक की उसकी यात्रा का रास्ता, उसे रास्ते से ज़्यादा मंजिल पसंद थी। जीन्स टॉप से घृणा उसकी चारित्रिक विशेषता थी। अपने गुणों और विचारों में पुरुषवादी समाज उसके लिए एकदम अनुकूल था। उसके व्यक्तित्व को इस तरह गढ़ने में परिवार की भूमिका ज़्यादा रही या फिर उसके पहले और अंतिम प्यार की, पता नही, पर दोनों ने मिलकर उसे ऐसा बना दिया था। उसके प्रेमी के संस्कार भी पूजा से बढ़कर होने ही थे, उसे भी जीन्स वाली लड़कियाँ देखने में भले ही आकर्षक लगती हों पर उसे अपनी बेग़म बनाना उसे क़तई मंजूर न था। 
                            दोनों स्कूल से लौटते हुए कभी आँखों-आँखों में एक दूसरे से कुछ बतला भले ही लें लेकिन इसे लेकर वो इतने सतर्क रहते की किसी को कानोंकान ख़बर ना पड़े। प्रेम एक तरफ तो कोमलता देता है लेकिन एक का प्रेम बाकियों को शूल की तरह चुभता भी है गांव तो दूर की बात है शहरों में भी यही हाल है, मजाल है कि कोई ज़रा भी भटकने पाए। फिर भी ये दोनों कहीं ना कहीं से मिलने की जुगत लगा ही लेते थे। यूसुफ़ ने पूजा को एक फ़ोन भी दिया था जिसे वो अपने स्कूल बैग में छुपाए रखती थी और एक बार पकड़े जाने पर जबरदस्त तरीक़े से पिटी भी थी। वे घंटों फ़ोन पर बात नही करते थे और न ही साथ कहीं घूम पाते थे पर हमेशा एक दूसरे के ख़यालों में खोए रहते थे। दोनों की कल्पनाओं में उनका एक घर रोज़ बन जाया करता था जिसमें ये दोनों शाम का खाना साथ खा रहे होते थे, इसी कल्पना की तरह यूसुफ़ को पसंद था अज़ान होते ही पूजा का अपना सर ढक लेना।
                            यूसुफ़ कभी भागकर शादी नही करना चाहता था, लेकिन वक़्त ने उसे मजबूर कर दिया। एक ओर नई दिल्ली स्टेशन से उसने हर तरफ की ट्रेन की जानकारी इकट्ठा कर ली, वहीं दूसरी तरफ उसके एक दोस्त ने एक वक़ील से भी उसकी बात करा दी। सब इतना जल्दी हो रहा था कि यूसुफ़ कुछ समझ ही नही पा रहा था कि क्या करे। घंटों सोच-सोचकर उसका सर फटा जा रहा था, पर हाथ कुछ लग ही नही रहा था। यूसुफ़ के घर वाले तो पूजा से शादी के लिए राज़ी हो गए लेकिन पूजा की माँ को सब जानकारी होते हुए भी वो कुछ बोली नही। यूसुफ़ बार-बार उनके आगे गिड़गिड़ाता रहा, वह भी हाँ-ना करके टालती रहीं। उन्होंने पूजा के पापा को कुछ बताया नही। क्योंकि वो जानती थीं कि अगर उन्होंने ये बात पूजा के पापा को बताई तो वो उसे मार ही डालेंगे।
                         आठ साल दोनो के प्रेम संबंध को हो चुके थे, दोनों ही पीछे हटना नही चाहते थे। पूजा का शादी जल्दबाज़ी में तय हुई, हफ्ते भर बाद का ही दिन शादी के लिए तय कर लिया गया। यूसुफ़ की जान पर बन आई, वो ऐसा होते हुए देख ही नही सकता था। सारे इंतज़ाम वो पहले ही कर चुका था। लेकिन उसके हाथ में कुछ आ ही नही रहा था। पूजा ने यूसुफ़ से आख़री बार कोई बात नही की। बीतता हुआ हर लम्हा यूसुफ़ को और बेचैन कर रहा था साथ ही पूजा से बात ना हो पाने का दुख भी उसकी बेचैनी को और बढ़ा रहा था। यहाँ पूजा की उस सहेली ने भी यूसुफ़ का साथ देने से मना कर दिया जो दोनों की बातें एक-दूसरे तक पहुँचाया करती थी। देखते ही देखते पूजा की शादी का दिन आगया।
                           उस दिन सुबह जल्दी ही यूसुफ़ घर से निकल गया। पर कहीं गया नही। यहीं सदर बाज़ार की गलियों में भटकता रहा। फ़ोन पर फ़ोन करने का भी कोई फायदा नही होता। पूजा वो फ़ोन बन्द कर चुकी थी। अब उसके पास कुछ नही था। वो एकदम ख़ाली हो गया था। जो डर उसके मन में कई सालों से बना हुआ था वही आज सच हो गया। पूजा अब उसकी नही हुई। वो एकदम चुप हो गया, कुछ बोला नही, दोस्तों से भी नही। शाम को घर पहुँचा तब पूजा की सहेली ने बताया कि पूजा ने ज़हर पी लिया।
                          आज यूसुफ़ को नही पता पूजा कहाँ है। वो नही जानता कि उसकी शादी हुई या नही। उसे बस इतना ही पता चला कि पूजा ने ज़हर पिया था। लेकिन उस दिन शादी भी हुई थी, वो कौन थी जो फेरों पर बैठी थी? मुझे भी नही पता आज पूजा ज़िंदा है या नही, मैं बस इतना जानता हूँ कि कभी यूसुफ़ उसे बहुत प्यार करता था, शायद आज भी करता हो। लेकिन अब कभी पूजा का कोई ज़िक्र यूसुफ़ की ज़बान पर नही आता। उसकी सहेली भी सारे राज़ अपने सीने में जमाए बैठी है। वो भी अब यूसुफ़ को मिलती नही। सब अचानक से बंद हो गया एक दरवाज़े की तरह। पर अब भी कभी मुझे फ़ोन पर पूजा से की गई वो बातें याद आजाती है तो लगता है कल ही कि बात है। मुझे एक बार तो उससे मिलना ही चाहिए था क्योंकि वो यूसुफ़ की प्रेमिका थी और यूसुफ़ मेरा पात्र।

देवेश, 23 नवम्बर 2017

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

तस्वीरों में कहना

वहाँ बार-बार कुछ कह देने की इच्छा है। लेकिन किसी को कुछ बता देने का दावा नही। कहना सिर्फ शब्दों से ही थोड़ी होता है। तस्वीरें भी कहती हैं, जितना वो कह पाती हैं। यहाँ गाँव की तस्वीरों को इस तरह डालना भी कुछ कहता है। ये दूरी को एकदम से पाट देने जैसा है। मैंने कभी बहराइच नही देखा, कभी देख पाऊंगा या नही कुछ पता नही, लेकिन तस्वीरों से मुझे ये तो पता चल रहा है कि वो अब बदल रहा है। बदलना तो नियति है ही लेकिन इस तरह की आधुनिकता में बदलना नियति हो जाएगी इसका अंदाज़ा भी किसी ने कभी लगाया ही होगा। सर ने कहा इन्हें इस तरह यहाँ लगा देना और इस तरह लिख देना फिज़ूल है। लेकिन मैं ऐसा नही मानता। यहाँ बात जहाँ तक निरर्थकता की है तो यह बात साफ है कि हर बात हर किसी के लिए समान महत्व नही रखती उसमें भी एक अंतर यहाँ हो जाता है कि महत्व देने के पीछे कारण क्या है। यही कारण ही महत्व निर्धारित करते हैं। उनके इस तरह तस्वीरों के माध्यम से कहने में कहे जाने से अलग एक मौन भी है, जहाँ कहे जाने के पीछे एक कहानी बताने की इच्छा है। लेकिन कहा गया खुलेगा तब जब आप कहने वाले को समझते हों।
                            इन तस्वीरों को इस तरह लेना एक समय को समेट लेने की कोशिश भी है और बेचैनी भी और इसी समय में आधुनिकता को विचारता हुआ एक शोधार्थी भी है जो तस्वीरों की अपनी अलग दुनिया गढ़ रहा है, नज़र भी उसकी अपनी है। नज़र का इस प्रकार बने जाने में भी उसकी ही मेहनत है। हम सभी इस तरह सबकुछ समेट लेने की इच्छाओं से भर जाते हैं, थोड़ा बहुत समेट भी लेते हैं लेकिन धीरे-धीरे वह सब स्मृति से रिसरिसकर खो जाता है। इन डिजिटल तस्वीरों में रिसने जैसा कुछ नही होता ये धीरे-धीरे नही जाती अचानक खो जाती हैं और हम उन्हें ढूंढते रह जाते हैं।

देवेश, 1 दिसम्बर  2017

सोमवार, 13 नवंबर 2017

बेचैनी का कवि

आज उनका जन्मदिन है। आज वो पूरे सौ बरस के हो जाते। उम्र बहुत अधिक नही थी जब वे गुज़र गए। उनका जाना दिखने में बिल्कुल एक सामान्य इनसान के जाने जैसा ही था। तब उन्हें इतना कोई जानता भी नही था, और जो जानते भी थे उनमें से अधिकतर को उनकी कोई परवाह भी नही थी। पर सब ये जानते थे कि ये जो बीमार बिस्तर पर पड़ा है ये कवि भी है। सब ये मानते थे कि ये जो कविताएं करता है वो किसी को समझ नही आती इसलिए ना पढ़ने से कोई नुकसान नही। 
                        ये व्यक्ति जो बिस्तर पर लेटा हुआ था इसे इन सब बातों से कोई फर्क नही पड़ा, वह लिखता रहा अपनी तरह से और उलझता रहा उन सब बातों में जिन बातों से किसी को कोई फर्क नही पड़ता। अब इन्हें मर जाने का भी कोई ग़म नही, जिन बेचैनियों में ये तड़पे वह सब ये कह चुके हैं। जो मर गया वह केवल शरीर था कवि मरा नही, ये कवि मरेगा नही। इस कवि ने रोशनियों के बजाए अंधेरे को बुनना चुना। इन्होंने चुना धरती की खोहों में दुबके रहस्य के उजागर को। असली और नकली के भेद के पार इन दोनों को मिलाकर इन्होंने एक अलग संसार रचा जिसमें छायावाद जैसा रहस्यवाद भले ही लगे लेकिन वैसी कोमलता कतई नही है। जितना उबड़-खाबड़ इन्होंने देखा-सहा इतना ही खुरदुरा कहा भी। 
                        मैं हमेशा इनकी उम्र का अंदाज़ा लगता था और सोचता था कि शायद इन्हें कभी देख पाता, निराला के बारे में भी मैं यही सोचता हूँ, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं देख भी लेता तो कोई बड़ी घटना नही होती। तब बस 'छायास्मृति' जैसा ही कुछ लिख दिया होता। कवि कैसा है ये हमें कवि को मिलकर कभी पता नही चल सकता, कवि कि गहराई का रास्ता केवल उसकी कविता से होकर जाता है। और कवि मौलिक रूप से केवल अपनी कविता में ही बच पाता है। लेकिन ये अच्छी बात है कि इस कवि को हमनें कम से कम मरने से पहले पहचान लिया और ये माना कि ये बड़ा कवि है। जिनपर ठप्पा नही लग पाता उनकी बात यहाँ करना अप्रासंगिक होगा
                      जन्मदिवस पर मृत्यु को याद करना पता नही ठीक है या नही पर इसे ऐसे ही कहा जाना था। ये समय भी मृत्यु से कम नही। इस समय में ज़रूरी है कि हम मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़े और महसूस करें कि हम अभी भी मरे नही हैं। एक बेचैन करने वाला कवि यहाँ तक बेचैन कर देने वाला कि कोई लड़का उनकी किताबों को अपने कमरे से बाहर कर दे, सदियों में एक होता है। मुक्ति के लिए छटपटाहट को बढ़ा देने वाले कवि मुक्तिबोध को नमन।

देवेश, 13 नवम्बर 2017

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

उसकी कहानी

पता नही उन दिनों वो क्या सोचता रहा होगा जब वो अस्पताल में भर्ती था।अब तक तो कभी सोचा भी नही होगा कि एक दिन इस तरह फूले हुए पैरों समेत वो अपने को सरकारी अस्पताल के उस खचाखच भरे वार्ड में पाएगा। भारी आँखों और बोझिल होती आवाज़ से कुछ कहने की नाक़ाम कोशिश करता हुआ वह कितना असहाय महसूस कर रहा होगा। वो ज़िन्दगी में कितना बेफिक्र था। पता नही उसे अपने बीवी बच्चों की कोई चिंता थी भी या नही। अस्पताल में भर्ती करने वाले फॉर्म में उसकी उम्र शायद सत्ताईस वर्ष चढ़ी होगी। शादी को अब लगभग तीन साल हो रहे होंगे। अब वो एक बच्चे का बाप भी है। लेकिन अब भी वो खुद को एक लड़का ही मानता है। पिछले पंद्रह अगस्त को किस तरह उसे चालाकी से हमारी पतंग ले ली थी। तब से उसकी तरफ देखने का मेरा नज़रिया एकाएक बदल गया। पड़ोसी तो वह था पर कभी ना तो मदद की और ना शायद मांगी। उसकी बारात सुबह-सुबह गई थी उस दिन बड़ा सुंदर लग रहा था। तब वो काम नही करता था हाँ कभी-कभी अपनी माँ की रेहड़ी पर खड़ा हो जाया करता था, गुटखा भी खाता था और शायद तब शराब भी पीता होगा। पता नही वो क्या परिस्थितियाँ रही होंगी जब उसकी शादी का फैंसला लिया गया होगा। हालांकि ज़िम्मेदारियाँ उठाने के क़ाबिल वो था नही। समाज इसी तरह हमारे विचार गढ़ता है कि अगर लड़का नाकारा है तो उसकी शादी कर दो तो सब ठीक हो जाएगा। इससे अगर किसी लड़की की ज़िंदगी हलकान हो तो हो। हो भी गई। अपनी माँ की हर बात को वो अनसुना करता रहा, कभी टिककर काम नही किया। और अब अस्पताल में पड़ा वो सब याद कर रहा है। 
                  ज़रा देर बाद आँखों के आगे एक चकरी सी घूमी होगी। दिखाई दिए होंगे पापा, दादी, चाचा। बचपन की सभी छवियाँ घूम गईं होंगी। और तब शायद अपनी हालत पर दुःख और पश्चाताप भी हुआ होगा। पर अब कोई फायदा नही। वो कहने की कोशिश भी कर रहा है तो मुँह नही खुल रहा। पैर भी महसूस नही हो रहे लग रहा है जैसे धंसा जा रहा है। बेतहाशा आँसू बह रहे हैं।
                  उसकी बीवी की उम्र उससे कम है। उसके साथ उसका ससुराल पक्ष है पर वो नही रहा जिसके साथ शादीकर यहाँ आई थी। अब केवल वो बच्चा बचा है जिसके सहारे वो अपनी ज़िंदगी गुज़ारने की कोशिश करेगी वो। समझ नही पाता कि उसका बच्चा उसके जीवन की कैसी कहानी सुनेगा। वो अपने बच्चे के सामने उसके पिता को कैसा रचेगी। किन बातों को वो छुपाएगी और किन्हें चाव से बताएगी। 

देवेश, 15 अक्टूबर 2017

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

बच्चा फंस गया

जैसे ही उसने मझे देखा वो एक क्षण अचानक रुक गया फिर एकदम जल्दी से बोल गया "आओ सर मसाज" वो उंगली से जिस तरफ इशारा कर रहा था वहाँ होटल के बेसमेंट में जाती सीढियां थी जिसपर पारदर्शी काँच का दरवाज़ा था लेकिन वो दरवाज़ा मसाज करवाते हुए महिलाओं और पुरुषों के चित्रों से ढका हुआ था। वह जिस संकोच और भावशून्य चेहरे के साथ रास्ते में आने-जाने वालों को टोक रहा था, उससे ये साफ पता चल रहा था कि ये लड़का यहाँ नया है और उसे ये काम भा नही रहा है। उम्र उसकी चौदह से सोलह साल रही होगी। दिल्ली का वह नही था अन्यथा वो इस जगह इस तरह नही होता। इसका कोई अंदाज़ा नही लगाया जा सकता कि वह कितना पढ़ा होगा। अगर वह पढ़ता ही तो यहाँ नही होता, पर इस बात का कोई दावा भी नही किया जा सकता। पता नही वो कौन सी परिस्थितियाँ रही होंगी जब उसे यूपी या बिहार से दिल्ली आना पड़ा होगा। ट्रेन की धुकधुकी के बीच ना जाने दिल्ली के कैसे-कैसे चित्र बने होंगे। पता नही उन चित्रों में इंडिया गेट के अलावा और कोई ईमारत बन भी पाई होगी या नही। इस सफ़र के बीच उसने कई सपने भी बुने होंगे, उन सपनों में उसके माँ-बाप की मौजूदगी रही होगी या नही ये तो वही जाने, मैं तो ये भी नही जानता कि उसके दिल्ली पहुँचने में उसके माँ- बाप का कितना हाथ रहा है। लेकिन बात यह है कि अब वो दिल्ली में है और बहुत उलझा हुआ है। मसाज पार्लर की तरफ इशारा करते हुए उसका मन कैसा-कैसा हो जाता होगा। उससे ज़्यादा अजीब उसे तब लगता होगा जब लोग उसे किसी अपराधी की नज़र से देखते हैं। उसका मन मेरे मन से कितना भिन्न होगा ना। मैं कभी वैसा महसूस नही कर पाऊंगा जैसा वो महसूस कर रहा है। कितना कुछ तो है जो कहा नही जा पा रहा। मैं उससे फिर कभी मिलूंगा तब कुछ कहूँगा नही बस चुपचाप उसके पास से गुज़र जाऊंगा, पर वो गुज़रना वहीं पर रुक जाने जैसा ही होगा।

देवेश, 20 सितम्बर 2017 

गुरुवार, 22 जून 2017

पागलपन

यहाँ पास में ही स्टेशन है। सुबह शाम ट्रेनों के भोंपू की आवाज़ आती है। सर्दियों में तो सूचना देने वाली लड़की की आवाज़ भी ठीक-ठीक सुनी जा सकती है। साल भर में लाखों लोग सफ़र करते हैं यहाँ से। विश्व भर के लोग रहते हैं दिल्ली में उनका आना-जाना तो लगा ही रहता है। यहाँ आते-जाते कितने ही लोग अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं। कुछ भटक जाते हैं, कुछ उठा लिए जाते है। जिन्हें कुछ समझ होती है और पैसा हाथ होता है वो अपने घर-द्वार पहुँच जाते हैं लेकिन जिनपर कोई सूत्र नही होता वो यहीं छूट जाते है। उनमें से कई यहीं आसपास काम पर लग जाते हैं ख़ासकर बच्चे और बूढ़े। जो लोग परिवार से बिछड़ने का सदमा बर्दाश्त नही कर पाते वो धीरे-धीरे भ्रमित होने लगते हैं। उनकी चुप्पी उनके दिमाग़ पर हावी होने लगती है। एक स्थिति ऐसी आती है जब वे पागल हो जाते हैं। तब इनकी चुप्पी एक निरर्थक बातों में तबदील हो जाती है। वे लगातार किसी अदृश्य से बातें करते हैं। एक सामान्य व्यक्ति के लिए ये एक असामान्य स्थिति है। ये भूल जाते हैं अपनी पहचान, इनके पास केवल दो चीज़ें होती है इनकी बातें और इनका पेट। इन्हें कोई चिकित्सीय सहायता भी नही मिलती। ये घूमते रहते हैं शहर दर शहर, ये भूल जाते हैं अपना सबकुछ और एक दिन किसी फुटपाथ पर मृत पाए जाते हैं।
                                                                             बचपन में हम जब पुल पर टहलने जाया करते थे तो हमें एक पागल रोज़ दिखता था। सफ़ेद मैले हलके लम्बे बाल, काला चेहरा, मैले कमीज़ और पैन्ट। बाएं हाथ में एक पन्नी थामे रहता उसी हाथ में छोटी डायरी के साइज़ के कागज़ भी थामे रहता। दाएं हाथ में एक पेन या उसका रिफिल। ज़मीन पर बैठकर बस कागजों पर ना जाने क्या-क्या लिखता रहता। चाहे कुछ भी हो वो बस लगा ही रहता। वो देवनागरी में नही लिखता था, वो दक्षिण भारत की कोई भाषा थी। तब मैं छोटा था और सोचा करता था कि कभी इस पागल की ग़ैरमौजूदगी में इसके लिखे कुछ कागज़ चुरा लूँगा और उस भाषा को पहचानने वाले किसी व्यक्ति से पढवाउंगा। ये कभी हो नही पाया। पागल शब्द के अन्दर ढक जाता है सब उम्र, व्यक्तित्व, जात आदि तब केवल एक शब्द ही व्यक्ति की पहचान बन जाती है। कितने ही साल हुए वो फिर दिखाई ही नही दिया, पता नही कहाँ गायब हो गया।
                                                                            साहित्य पागलों को हमेशा एक अलग नज़र से देखता है। हालाँकि पागल शब्द का प्रयोग जिन लक्षणों को बताने के लिए होता है वे तो वही रहते हैं लेकिन सन्दर्भ बदल जाते हैं कभी वह प्रेम का सन्दर्भ लिए रहता है तो कभी भक्ति आदि का। साहित्य में पागल चरित्रों का निर्माण हमेशा पते की बात कहने के लिए होता रहा है जो हमें पागल नज़र आता है वही ऐसी बातें कह जाता है जो पूरे कथा, नाटक, उपन्यास का सार हो जाती हैं। इन पागल पात्रों के माध्यम से समाज की कोई ऐसी परत उघडती है जिसे हम सामान्य रूप से नही देख पाते। इनके पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी होती है।
                                                                              हम भी कभी-कभी किन्ही ख़ास परिस्थितियों में खुद को पागल सा महसूस करते हैं। जब हम खुद पर, अपने दिमाग़ पर अपना नियंत्रण खोने लगते हैं। लेकिन हम पूरे पागल होते नही। पागल होना असल में समझदार होते जाना है। जब आप सच्चाइयों को जान जाते हैं तो आप पागल कह दिए जाते है। आप सवाल उठाइये तो तुरंत आपका कोई शुभचिंतक आपको कह देगा 'पागल है क्या?' लेकिन थोड़ा थोड़ा पागल होना ज़रूरी है। लीक से हटकर सोचना और चलना भी पागलपन है। बिना सनकी या पागल हुए कलाकार नही हुआ जा सकता कलाकार होने के लिये बंदिशों को तोड़ना होता है सीमाओं को विस्तृत करना होता है। सीमाओं तो खोलना सिखाता है पागलपन।

 देवेश, 22 जून 2017