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मिसफिट

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एक दिन अचानक सब नही बदला। सब बदल रहा था धीरे-धीरे, या फिर कुछ बदला ही नही अब तक। हाँ कुछ भी नही बदला। जो जैसा है वो वैसे ही रहना चाहता है। वो जहाँ बैठा है वहाँ से इंच भर भी नही खिसकना चाहता किसी और के लिए। तो क्यों उन्हें वहाँ होना चाहिए जहाँ वो होकर भी नही हैं। क्या वो उनकी दुनिया है भी? या वो अपनी बातों को ही पुल बनाकर वहाँ तक पहुँचने की नाकाम कोशिशें कर रहें हैं पिछले कुछ सालों से? वो भले ही कितनी कोशिशें कर लें लेकिन वो जानते हैं ये दुनिया उनकी नही। वो कभी भी उसमें रम नही पाए, ना ही कभी रम पाएंगे। वो अपनी दुनिया से निकलकर किन्ही और की दुनिया में अगर चाहेंगे भी तो जम नही पाएंगे। अपने से अलग उस दुनिया में वो ख़ुद को हमेशा मिसफिट ही महसूस करेंगे।
असल में मिसफिट होना ही उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी है। इन सभी बातों को सोचते हुए वो तीनों कई अन्य जगहों से अनुपस्थित हो गए हैं। उनकी अपनी दुनिया, नाटक, संगीत, चित्र और साहित्य के संसार से वो सभी अनुपस्थित हैं। इस अनुपस्थिति में वो कहीं भी नही हैं। उनके होने न होनें से किसी को कोई फर्क भी नही पड़ेगा। आज उनके आने से या कल जाने से कुछ होगा नही…