पोस्ट

जुलाई, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मरवा के पौधे सी

चित्र
मैं कुछ लिख दूँ  उसके लिए जिससे मैं अभी तक मिला नही। उसकी वो आदत जिससे मुझे चिढ़ होती है,और वो जिससे मुझे प्यार है।ये दोनों आदतें अगर उसमें ना हो तो शायद मैं उसे पहचान भी न पाऊं। उसका चेहरा उस पर खिंचती दो टेढ़ी रेखाएँ और सिरों पर से मुड़ते उसके भूरे बाल। छोड़ो... मैं अभी वो चेहरा नही बनाऊंगा। तुम अभी वो सारी बातें भूल जाओ जो मैंने ऊपर लिखी हैं। ठहरो मैं अभी रुक जाऊं और बंद करदूं सोचना। अभी यहाँ उसके बारे में नही कहूँगा जिसे मैं मिला नही। उसके मिल जाने पर भी क्या होगा। मैं उसके साथ रहूँगा नही। तुम इस बात को इसी तरह समझना जैसे समझते आए हो। इस कहानी में भी कुछ नया नही है। ये कहानी अगर एक पौधा होती तो ये जरूर मरवा का पौधा होता। जिसके होने न होने से किसी को कोई फ़र्क नही पड़ता। उसकी मादक महक भी दूर तक नही जाती। और इसमें कोई ऐसा आकर्षण भी नही कि कोई खिंचा चला आए।जूते के तसमों को बाँधते हुए शायद ये कहानी मुझमे घुलती रहे और मैं बस ज़रा सा हँस दूँ। गर्मी में जूते पहने रहना भी बड़ी मुश्किल का काम है। क्योंकि ये गर्मी का मौसम है। उमस को अंदर बनाए रखने का कोई तुक नही। बाहर बादल आते हैं जाते हैं पर बरसते…

फैसले की घड़ी में

चित्र
कभी सोचा नही था कि मेरी ज़िन्दगी में भी एक ऐसा समय आएगा जब खुद को इतना उलझा हुआ पाउँगा। बचपन में किसी विषय की गहराई का पता नही होता, तब सब एक खेल जैसा लगता है। तब लगता था की काश बिना पढ़े ही मैं बड़ा हो जाऊं। मोटी-मोटी किताबें देखकर तब भय होता था। आज जब मैं ग्रेजुएट हो चुका हूँ तो एकाएक भविष्य जैसे धुंधला गया है। अभी कुछ समय पहले तक सब स्पष्ट था। अब सारी चीजें एक दूसरे में घुल रही है, सारे विचार, योजनाएं, दावे, आशाएँ, संभावनाएं। अब जैसे सारी योजनाओं के आगे एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है। इसका उत्तर मुझसे बनता ही नही। मैं क्या करूँ? इस सब में मैं खुद को अकेला महसूस नही कर रहा, मेरे साथ एक पूरी पीढ़ी है जो अभी इसी वक़्त इन्ही सवालों से जूझ रही है। इस सब से पार पाना जितना कठिन है उतना आसान भी।

सभी हमें कह देते हैं कि ये रास्ता सही है, ये गलत, इसमें ज़्यादा कठिनाई होगी या ये रास्ता ज़्यादा बेहतर रहेगा। उन सभी के सुझाए रास्तों पर चलने को हम तैयार भी हो जाएं तो। क्या हम चल भी पाएंगे? कहीं ऐसा तो नही की हम वो रास्ता कभी चुनना ही न चाहें। किसी सेमीनार में किसी ने कहा था कि सबसे पहले ये ज…

जुड़ती-टूटती बातें और हमारा मन

चित्र
सुबह आँख खुलते ही फोन को खोजता हमारा हाथ अचानक उसे न पाकर रुक जाता है। और हम चौंक कर उठ जाते हैं। समय देखकर लगता है अभी तो सात ही बजे है बोहोत समय है सोने के लिए। चारदीवारी के अंदर हम ताज़ी हवा को न पाकर कुछ बेचैन तो होते है पर उसका कोई उपाए न पाकर बेशर्मों की तरह फिर सो जाते है। सवा ग्यारह बजे फिर आँख खुलती है। फ़ोन बज रहा है सब अपने अपने काम पर चले गए हैं घर में कोई नही अब फ़ोन हमें ही ढूढंना है। रात को फ़ोन भी करवटें लेता लेता कब पलंग के नीचे पहुँच गया उसे भी पता नही चला। फ़ोन सोता नही। फोन कभी सपने भी नही देखता। उसके अंदर पूरी दुनिया है पर प्राण नही। हम भी कभी फ़ोन हो जाएंगे। टाइम ज़्यादा हो गया सोचकर मजबूरी में एक ज़ोरदार अंगड़ाई लेकर उठ जाएंगे। उठ जाने पर भी कोई काम नही होगा बस यूँ ही घुमते रहेंगे अंदर अंदर। हमारे अंदर भी बाहर जैसा खुलापन होना चाहिए। पर वहां नियंत्रण हमारा होता है। सब हमारे लायक हमारा चाहा। 
उन घटनाओं को दोबारा दोबारा घटाकर हम हज़ारों बार वही जीने की कोशिश करते हैं जो नही जी पाए। उस दिन की बात जब मैं सोच रहा हूँ कि अगर उस सामने खड़े लड़के से मैंने नाटक का समय पूछा होता तब …