गुरुवार, 22 जून 2017

पागलपन

यहाँ पास में ही स्टेशन है। सुबह शाम ट्रेनों के भोंपू की आवाज़ आती है। सर्दियों में तो सूचना देने वाली लड़की की आवाज़ भी ठीक-ठीक सुनी जा सकती है। साल भर में लाखों लोग सफ़र करते हैं यहाँ से। विश्व भर के लोग रहते हैं दिल्ली में उनका आना-जाना तो लगा ही रहता है। यहाँ आते-जाते कितने ही लोग अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं। कुछ भटक जाते हैं, कुछ उठा लिए जाते है। जिन्हें कुछ समझ होती है और पैसा हाथ होता है वो अपने घर-द्वार पहुँच जाते हैं लेकिन जिनपर कोई सूत्र नही होता वो यहीं छूट जाते है। उनमें से कई यहीं आसपास काम पर लग जाते हैं ख़ासकर बच्चे और बूढ़े। जो लोग परिवार से बिछड़ने का सदमा बर्दाश्त नही कर पाते वो धीरे-धीरे भ्रमित होने लगते हैं। उनकी चुप्पी उनके दिमाग़ पर हावी होने लगती है। एक स्थिति ऐसी आती है जब वे पागल हो जाते हैं। तब इनकी चुप्पी एक निरर्थक बातों में तबदील हो जाती है। वे लगातार किसी अदृश्य से बातें करते हैं। एक सामान्य व्यक्ति के लिए ये एक असामान्य स्थिति है। ये भूल जाते हैं अपनी पहचान, इनके पास केवल दो चीज़ें होती है इनकी बातें और इनका पेट। इन्हें कोई चिकित्सीय सहायता भी नही मिलती। ये घूमते रहते हैं शहर दर शहर, ये भूल जाते हैं अपना सबकुछ और एक दिन किसी फुटपाथ पर मृत पाए जाते हैं।
                                                                             बचपन में हम जब पुल पर टहलने जाया करते थे तो हमें एक पागल रोज़ दिखता था। सफ़ेद मैले हलके लम्बे बाल, काला चेहरा, मैले कमीज़ और पैन्ट। बाएं हाथ में एक पन्नी थामे रहता उसी हाथ में छोटी डायरी के साइज़ के कागज़ भी थामे रहता। दाएं हाथ में एक पेन या उसका रिफिल। ज़मीन पर बैठकर बस कागजों पर ना जाने क्या-क्या लिखता रहता। चाहे कुछ भी हो वो बस लगा ही रहता। वो देवनागरी में नही लिखता था, वो दक्षिण भारत की कोई भाषा थी। तब मैं छोटा था और सोचा करता था कि कभी इस पागल की ग़ैरमौजूदगी में इसके लिखे कुछ कागज़ चुरा लूँगा और उस भाषा को पहचानने वाले किसी व्यक्ति से पढवाउंगा। ये कभी हो नही पाया। पागल शब्द के अन्दर ढक जाता है सब उम्र, व्यक्तित्व, जात आदि तब केवल एक शब्द ही व्यक्ति की पहचान बन जाती है। कितने ही साल हुए वो फिर दिखाई ही नही दिया, पता नही कहाँ गायब हो गया।
                                                                            साहित्य पागलों को हमेशा एक अलग नज़र से देखता है। हालाँकि पागल शब्द का प्रयोग जिन लक्षणों को बताने के लिए होता है वे तो वही रहते हैं लेकिन सन्दर्भ बदल जाते हैं कभी वह प्रेम का सन्दर्भ लिए रहता है तो कभी भक्ति आदि का। साहित्य में पागल चरित्रों का निर्माण हमेशा पते की बात कहने के लिए होता रहा है जो हमें पागल नज़र आता है वही ऐसी बातें कह जाता है जो पूरे कथा, नाटक, उपन्यास का सार हो जाती हैं। इन पागल पात्रों के माध्यम से समाज की कोई ऐसी परत उघडती है जिसे हम सामान्य रूप से नही देख पाते। इनके पागल हो जाने के पीछे भी एक कहानी होती है।
                                                                              हम भी कभी-कभी किन्ही ख़ास परिस्थितियों में खुद को पागल सा महसूस करते हैं। जब हम खुद पर, अपने दिमाग़ पर अपना नियंत्रण खोने लगते हैं। लेकिन हम पूरे पागल होते नही। पागल होना असल में समझदार होते जाना है। जब आप सच्चाइयों को जान जाते हैं तो आप पागल कह दिए जाते है। आप सवाल उठाइये तो तुरंत आपका कोई शुभचिंतक आपको कह देगा 'पागल है क्या?' लेकिन थोड़ा थोड़ा पागल होना ज़रूरी है। लीक से हटकर सोचना और चलना भी पागलपन है। बिना सनकी या पागल हुए कलाकार नही हुआ जा सकता कलाकार होने के लिये बंदिशों को तोड़ना होता है सीमाओं को विस्तृत करना होता है। सीमाओं तो खोलना सिखाता है पागलपन।

 देवेश, 22 जून 2017

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें