जाना

ये उसे भी नही पता होगा कि उसके इस तरह चले जाने से सब कितना बदल गया है। वो लड़का भी बदल गया है। पहले जैसा नही रहा। पहले जैसा कभी कुछ नही रहता। ये एक अच्छी बात है। जाने वाला भी बदल गया होगा लड़का इस बात से हमेशा डरा सा रहता है। उसे घूम-घूमकर पुरानी बातें याद आती हैं। अगर वो नही जाता तो? या जाने से पहले अगर लड़का उससे मिल लेता तो? या फिर अगर वो सब हुआ ही  होता तब?

अपनी कल्पनाओं में वो वापस उसी दिन पर लौटता है जिस दिन वो आखिरी बार मिले थे। वहाँ जाकर वो खूब तेज़-तेज़ बोलता है। रोता है। अपने भीतर वो सबकुछ सही करने की क्षणिक शांति को महसूसता है और लौट आता है। तब उसे लगता है कल्पनाएँ कितनी बेकार चीज़ होती हैं। उनपर नियंत्रण रखकर भी कुछ नही होता। इस तरह ये लड़का अतीत और वर्तमान के बीच कल्पना और असल के दरवाज़े से आता-जाता रहता है। झूलता और टकराता रहता है। 

एक दिन वो इस नतीजे पर पहुँचता है कि बीते साल ने उसे बर्बाद कर दिया है। पर ये किस तरह की बर्बादी है कि सबकुछ सही सलामत है? सब वैसा ही है। फिर जीभ और होंठों को हिलाकर दो शब्द एक साथ बुदबुदाता है 'आंतरिक बर्बादी'। इन्हें इस तरह बोलता है कि कोई सुन न ले। कहीं किसी को पता न चल जाए कि उसने अपने मनोभावों को दो शब्दों में ढाल दिया है। ये किस तरह के भाव है? सोचते हुए अगर उसकी आँख लग जाती तो शायद वो इस बात पर नही पहुँच पाता कि ये कितनी ओढ़ी हुई सी चिंताएं हैं। सब कुछ खुद का ही निर्मित किया हुआ है। दीवार भी, छत भी। तब इसमें खिड़की भी बनाई जा सकती है। पर बनाए कौन? आलस!

अब अगर ये सब फर्जी भाव हैं तो उसके दिन में कुछ चुभता सा क्यों रहता है? वो आगे क्यों नही बढ़ जाता। 'जो बीत गई सो बात गई' ये पंक्ति उसके दिमाग में उसी तरह चलने लगती है जैसे वायु प्रदूषण बताने वाले इलेक्ट्रिक बोर्ड पर खराब वायु की सूचनाएँ चलती हैं। पर इसे कभी शब्दशः महसूस नही कर पाता। जो बीत जाता है वह भी हमारे साथ बना रहता है। जीवन भर। उससे छूटना इतना आसान नहीं होता। स्मृति या कल्पना में वो वापस लौट-लौट आता है। अतीत में घटा हुआ कभी तो उसी सघनता से साथ महसूस होता है जैसे अनुभव किया था पर कभी हम खुद उससे पृथक होकर उसे एक घटना की तरह याद कर रहे होते हैं। उससे एकदम निरपेक्ष। 

ये लड़का स्मृतियों से भिड़कर भी कुछ कर नही पा रहा है। कोई कुछ नही कर पाता। ये तय कर चुका है कि अपने दुःख से अब निकल जाएगा। मौसम भी तो बदल गया है। इस तरह बैठे रहने से क्या होगा?, अपना समय बेकार क्यों करना?, इससे बेहतर है कि कुछ रचनात्मक काम करे। ज़िंदगी किसी के आने-जाने से बदल भले ही जाए, पर रुकती नही है। इसलिए रुको नही आगे बढ़ो!



पर यार, 

उसे इस तरह नही जाना था।
मुझसे बात तो की होती। मैं अपने मन की बातें तो कह लेता। पता नही अब कब लौटना होगा। 
मैं फ़ोन करूँ? 
नहीं!  
क्या उसे एक भी दिन मेरी याद नही आई होगी?
उन दिनों भी नही?

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