संदेश

इन दिनों

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यहाँ सब वैसा नहीं है जैसा पहले हुआ करता था। सब बदल गया है। मैं भी बदल गया हूँ। अब वैसा कुछ भी महसूस नही होता जैसा पहले हुआ करता था। धीरे-धीरे सम्वेदना से दूर छिटकता गया हूँ। दिन यूँ ही निकल रहे हैं। ये इंतजार जैसा ही है। पर ये इंतजार किसी समय का है या किसी व्यक्ति का समझ नही पा रहा हूँ। ये एक भरी दोपहरी है। चेहरा अब पसीने से भरा रहता है। ये उमस अब मुझमें भी उतरती जा रही है। ये सब बातें जिस शांत भाव से लिख रहा हूँ ये उससे दुगनी आक्रामकता से मेरे अंदर पल रही हैं।  मैं यहाँ साफ-साफ कुछ नही कहना चाहता। मैं एक भी सूत्र नही छोड़ना चाहता कि कोई उसे पकड़कर मुझतक पहुँच जाए। मैं ये भी नही चाहता कि मेरी इन अकेली बेचैनियों में कोई मेरे साथ हो। मुझे बस एकांत चाहिए जहाँ मैं अकेले जूझ सकूँ ख़ुद से। पढ़ाई से अब मोह छूट गया है। अकादमिक परिवेश से अजीब वितृष्णा हो गई है। ये एक ढाँचा है जो आपको अपनी तरह से अपने खाकों में फ़िट करने के लिए हमेशा दबाव बनाए रहता है। वो आपके सभी सपनों को रौंद डालता है। इसमें एक मज़ेदार बात ये भी है कि दुनिया-जहान में अपनी प्रगतिशीलता का डंका पीटने वाले महारथी भी अपनी ...

एक बयान

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हमें कहा गया कि हमें निश्चित समय पर वहाँ पहुँचना है। हम अपने शाम के काम स्थगित कर समय से पहले पहुँच गए। यह एक बड़ा पार्क है। सूखा हुआ पार्क। इसमें घास उगने की कोई संभावना नही बची है, पर कहीं-कहीं दूब चमकी सी उगी हुई है जिसे देखकर अचंभा ही होता है। ये रैन बसेरे के बाहर का आँगन है।  ये उनकी जगह है जिनकी कहीं कोई जगह नही। लेकिन से सभी कुछ ना कुछ काम करते है। बड़े भी बच्चे भी। कुछ बच्चे पढ़ते भी हैं।  सभी बच्चे बीच में बैठे हुए हैं और सर ऊपर कर उसे सुन रहे हैं जो ज़ोर-ज़ोर से भाषण दे रहा है। वो नीली कमीज वाला आदमी इन सभी का पहचाना हुआ है। ये आदमी इन्ही के अधिकार की बात कर रहा है। बीच में बैठे बच्चों को घेरा बनाकर घेरे हुए हैं कुछ जवान और बूढ़े लोग जो इनके बीच के नही हैं। वो इनसे ज़्यादा सुथरे हैं। इन सभी से ज़्यादा समझदार। दिलवाले हैं या नही ये नही पता। बीच में एक मैली सी सफ़ेद टी-शर्ट में एक लड़का खड़ा हुआ है। कल ही कि बात है इसे पुलिस ने पीटा है। वो ख़ुद ही अपनी आपबीती धीरे-धीरे बता रहा है। लोग सुन रहे हैं उसका अनुभव। वो बता रहा है कि वो किसी मसले को लेकर थाने में एफआईआर दर...

दुःख

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कुछ कहना क्या ज़रूरी होता है कहने के लिए? कहूँ भी तो किससे? कोई सुनना भी चाहता है? ना सुने तो ना सही! अगर कहना ना भी चाहो तो कोई समझेगा नही। इस स्थिति में बस अकेले जूझा जा सकता है। जूझने में एक इंतज़ार होता है इस दौर के खत्म हो जाने का। क्या मुझे भी इसे इंतज़ार की तरह ही लेना चाहिए? मेरी उम्मीदें तो बनी नही रह सकती। इसलिए ये दौर एक ऊब से भरा रहा है। ये हाथ-पांव बंधे होने जैसा है, कि कोई रह-रहकर आपके गले की रस्सी को उस हद तक खींच लेता है कि मृत्यु एकदम नज़दीक आ जाए और अचानक रस्सी छोड़ दे। बात बस ज़बान पर आजाए पर दिमाग़ सचेत होकर ज़हर का घूँट भर ले।                        खुद को इस तरह रोक लेने से भी कुछ नही हो रहा। एक युद्ध ही चल रहा है। जो भले ही अदृश्य लगे लेकिन जो अपना असर छोटे-छोटे संकेतों में दिखा जाता है, जिन्हें कोई पकड़ नही पाता। ना पकड़ पाए उसमें भी मेरी ही जीत है और हार भी। ये लिखावट भी उसी युद्ध का प्रतिफल है। जिस तरह मैं यहाँ लड़ रहा हूँ उसी तरह हर कोई लड़ रहा है लेकिन आधे मेरी तरह चुप हैं।       ...

छूटना

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उसने मुझे बताया नही की उसकी तरह वहाँ वो शहर भी अकेला है। अकेला होने का अर्थ प्रेम से खाली होना नही है। वहाँ उसके और यहाँ मेरे अकेलेपन में प्रेम का अस्तित्व है। उसका शहर वो शहर है जिसके लोग आपस में बतियाते नही हैं, लेकिन वो चुप भी नही रहते। ऐसी स्थिति में वो शहर बिल्कुल मेरी तरह होता है, चुप और तेज़। उसने पहले ही समझ लिया था कि एक न एक दिन ऐसा ज़रूर होगा कि हम अकेले होंगे। हम होंगे अलग-अलग शहरों में गाड़ियों के शोर और धुएं से अलग-अलग जूझते हुए और हमारा प्रेम भी अलग होगा। हम अलग-अलग घूम रहे होंगे अपने दिमागों में। यहाँ समझ नही आता कि क्यों वो उदासी पसर रही है जो गर्मियों की छुट्टियों में शाम को रात में बदलते देखने पर मेरे अंदर उतर जाया करती थी। ये उदासी अकेलापन क्या खुद का ही खड़ा किया हुआ है? क्या मैं इस सब से छूट नही जाना चाहता? मैं क्यों चीख़कर ये नही कह देता की मेरा मन नही लगता यहाँ, मुझे एकांत चाहिए! मुझे एक अलग जगह चाहिए। मैं बादलों से भरी अंधेरी दोपहरों में जी भरकर सोना चाहता हूँ। मुझे नही होना यहाँ। मेरे बिल्कुल बदल जाने तक मैं यहाँ से दूर चले जाना चाहता हूँ, उन नए लोगों के बीच जि...

मिसफिट

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एक दिन अचानक सब नही बदला। सब बदल रहा था धीरे-धीरे, या फिर कुछ बदला ही नही अब तक। हाँ कुछ भी नही बदला। जो जैसा है वो वैसे ही रहना चाहता है। वो जहाँ बैठा है वहाँ से इंच भर भी नही खिसकना चाहता किसी और के लिए। तो क्यों उन्हें वहाँ होना चाहिए जहाँ वो होकर भी नही हैं। क्या वो उनकी दुनिया है भी? या वो अपनी बातों को ही पुल बनाकर वहाँ तक पहुँचने की नाकाम कोशिशें कर रहें हैं पिछले कुछ सालों से? वो भले ही कितनी कोशिशें कर लें लेकिन वो जानते हैं ये दुनिया उनकी नही। वो कभी भी उसमें रम नही पाए, ना ही कभी रम पाएंगे। वो अपनी दुनिया से निकलकर किन्ही और की दुनिया में अगर चाहेंगे भी तो जम नही पाएंगे। अपने से अलग उस दुनिया में वो ख़ुद को हमेशा मिसफिट ही महसूस करेंगे। असल में मिसफिट होना ही उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी है। इन सभी बातों को सोचते हुए वो तीनों कई अन्य जगहों से अनुपस्थित हो गए हैं। उनकी अपनी दुनिया, नाटक, संगीत, चित्र और साहित्य के संसार से वो सभी अनुपस्थित हैं। इस अनुपस्थिति में वो कहीं भी नही हैं। उनके होने न होनें से किसी को कोई फर्क भी नही पड़ेगा। आज उनके आने से या कल जाने से कुछ ह...

एक अधूरी प्रेमकथा

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अभी कुछ कह देने की बेचैनी नही है, मन कुछ अजीब सा हो रहा है। बस उसकी याद आ रही है। आज से दो साल दो दिन पहले उसने ज़हर खाया था। जब उसका पहली बार नाम सुना था तब से अब तक मैं उसको एक भी बार नही मिला। बस उसकी कुछ तस्वीरें देखी थीं और एक बार फ़ोन पर बात की थी। उसका चेहरा जाना पहचान सा था, हमारी रिश्तेदारी में एक लड़की है राधा, पूजा बिलकुल उसकी तरह दिखती थी। पर वो राधा के बिलकुल उलट थी। उसे घर में रहना पसंद था। धर्म-कर्म में भी मन लगता था। पढ़ना उसके लिए सिर्फ एक मजबूरी थी, या कहें शादी तक की उसकी यात्रा का रास्ता, उसे रास्ते से ज़्यादा मंजिल पसंद थी। जीन्स टॉप से घृणा उसकी चारित्रिक विशेषता थी। अपने गुणों और विचारों में पुरुषवादी समाज उसके लिए एकदम अनुकूल था। उसके व्यक्तित्व को इस तरह गढ़ने में परिवार की भूमिका ज़्यादा रही या फिर उसके पहले और अंतिम प्यार की, पता नही, पर दोनों ने मिलकर उसे ऐसा बना दिया था। उसके प्रेमी के संस्कार भी पूजा से बढ़कर होने ही थे, उसे भी जीन्स वाली लड़कियाँ देखने में भले ही आकर्षक लगती हों पर उसे अपनी बेग़म बनाना उसे क़तई मंजूर न था।          ...

तस्वीरों में कहना

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वहाँ बार-बार कुछ कह देने की इच्छा है। लेकिन किसी को कुछ बता देने का दावा नही। कहना सिर्फ शब्दों से ही थोड़ी होता है। तस्वीरें भी कहती हैं, जितना वो कह पाती हैं। यहाँ गाँव की तस्वीरों को इस तरह डालना भी कुछ कहता है। ये दूरी को एकदम से पाट देने जैसा है। मैंने कभी बहराइच नही देखा, कभी देख पाऊंगा या नही कुछ पता नही, लेकिन तस्वीरों से मुझे ये तो पता चल रहा है कि वो अब बदल रहा है। बदलना तो नियति है ही लेकिन इस तरह की आधुनिकता में बदलना नियति हो जाएगी इसका अंदाज़ा भी किसी ने कभी लगाया ही होगा। सर ने कहा इन्हें इस तरह यहाँ लगा देना और इस तरह लिख देना फिज़ूल है। लेकिन मैं ऐसा नही मानता। यहाँ बात  जहाँ तक निरर्थकता की है तो यह बात साफ है कि हर बात हर किसी के लिए समान महत्व नही रखती उसमें भी एक अंतर यहाँ हो जाता है कि महत्व देने के पीछे कारण क्या है। यही कारण ही महत्व निर्धारित करते हैं। उनके इस तरह तस्वीरों के माध्यम से कहने में कहे जाने से अलग एक मौन भी है, जहाँ कहे जाने के पीछे एक कहानी बताने की इच्छा है। लेकिन कहा गया खुलेगा तब जब आप कहने वाले को समझते हों।        ...